सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि यदि सरकारी कर्मचारी (Government employees) रिश्वत मांगने और लेने का दोषी है तो सह-आरोपी के बरी होने या साज़िश साबित न होने के आधार पर उसे बरी नहीं किया जा सकता।
नई दिल्ली
भ्रष्टाचार के मामलों में एक अहम सिद्धांत स्पष्ट करते हुए Supreme Court of India ने कहा है कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी खुद रिश्वत मांगता और स्वीकार करता पाया जाता है, तो उसे केवल इस आधार पर बरी नहीं किया जा सकता कि उसके साथ नामजद सह-आरोपी साज़िश साबित न होने के कारण छूट गया।
जस्टिस Sanjay Kumar और जस्टिस K. Vinod Chandran की पीठ ने इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ एक इनकम टैक्स इंस्पेक्टर को दी गई राहत को पलट दिया। अदालत ने कहा कि रिश्वत मांगने और उसे स्वीकार करने का अपराध अपने आप में स्वतंत्र है और यह आपराधिक साज़िश के आरोप से अलग भी साबित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
यह मामला उस समय सामने आया जब Rajasthan High Court ने एक इनकम टैक्स इंस्पेक्टर को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि सह-आरोपी के खिलाफ साज़िश (IPC धारा 120B) साबित नहीं हुई, इसलिए रिश्वत का आरोप भी टिक नहीं सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ स्वतंत्र सबूत मौजूद हों कि उसने रिश्वत मांगी और ली, तो केवल साज़िश का आरोप सिद्ध न होने से भ्रष्टाचार का अपराध समाप्त नहीं हो जाता।
2010 का ट्रैप केस
मामले की शुरुआत 2010 में हुई थी। पवन अग्रवाल नाम के कारोबारी, जिनकी फर्म का आयकर आकलन चल रहा था, ने Central Bureau of Investigation में शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि इनकम टैक्स इंस्पेक्टर बलजीत सिंह ने अपने वरिष्ठ अधिकारी, जॉइंट कमिश्नर अरुण कुमार गुर्जर की ओर से असेसमेंट बिना परेशानी पूरा करने के लिए 5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी।
सीबीआई ने 29 दिसंबर 2010 को जाल बिछाया। स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में 1000 रुपये के 200 नोटों पर फिनोलफ्थेलिन पाउडर लगाया गया। शिकायतकर्ता ने दफ्तर में आरोपी को लिफाफा दिया और उसने उसे अपने कोट की जेब में रख लिया। तय संकेत मिलते ही सीबीआई टीम ने छापा मारा और लिफाफा बरामद कर लिया। आरोपी के हाथ धुलवाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया, जिससे पाउडर लगे नोट छूने की पुष्टि हुई।
ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को IPC की धारा 120B और Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7 के तहत दोषी ठहराते हुए चार-चार साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए दोषसिद्धि रद्द कर दी कि साज़िश और रिश्वत मांगने के पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार का मुख्य अपराध साज़िश के आरोप से अलग है और स्वतंत्र रूप से साबित किया जा सकता है।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के ठोस प्रमाण मौजूद हैं, तो सह-आरोपी के बरी होने या साज़िश का आरोप साबित न होने से उसका अपराध समाप्त नहीं हो जाता।
सज़ा कम, दोष बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी करने का आदेश रद्द करते हुए उसे दोषी माना, लेकिन उसकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सज़ा चार साल से घटाकर एक साल कर दी।
अदालत की यह टिप्पणी भविष्य के भ्रष्टाचार मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल मानी जा रही है, क्योंकि इससे यह सिद्धांत स्पष्ट होता है कि रिश्वत का अपराध अपने आप में पूर्ण है—और उससे बच निकलने के लिए सह-आरोपी की आड़ नहीं ली जा सकती।
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