भारतीय रेलवे (Indian Railways) ने ट्रैक सुरक्षा बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया है। अब पुलों और क्रॉसिंग पर कॉम्पोजिट स्लीपर लगाए जाएंगे और एआई तकनीक से रेलवे ट्रैक की निगरानी की जाएगी, जिससे रेल यात्रा अधिक सुरक्षित और आरामदायक बनेगी।
नई दिल्ली
रेल पटरियों के नीचे की दुनिया अब पहले जैसी नहीं रहने वाली। भारतीय रेलवे ने ट्रैक सुरक्षा और यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए कई ऐसे फैसले किए हैं, जिनसे ट्रेन यात्रा अधिक सुरक्षित और आरामदायक बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में रेल भवन में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में ट्रैक टेक्नोलॉजी से जुड़े कई बड़े निर्णय लिए गए।
बैठक में तय किया गया कि पुलों के एप्रोच, पॉइंट्स और क्रॉसिंग पर अब पारंपरिक लोहे या कंक्रीट के बजाय कॉम्पोजिट स्लीपर लगाए जाएंगे। ये स्लीपर पुराने स्लीपरों की तुलना में काफी हल्के हैं, लेकिन मजबूती के मामले में कहीं आगे हैं। तकनीकी तौर पर ये प्रति वर्ग सेंटीमीटर करीब 700 किलोग्राम तक भार सहने में सक्षम हैं।
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रेलवे अधिकारियों का मानना है कि इन स्लीपरों की कुशनिंग बेहतर होने से जब ट्रेन पुलों या क्रॉसिंग से गुजरेगी तो झटके कम महसूस होंगे और यात्रियों का सफर ज्यादा आरामदायक होगा। एक और खासियत यह भी है कि इन्हें उस स्थान की जरूरत के अनुसार डिजाइन कर लगाया जा सकता है, जिससे रखरखाव भी आसान होगा और लागत में भी कमी आएगी।
रेल ट्रैक की निगरानी के तरीके में भी बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब निरीक्षण गाड़ियों में AI तकनीक से लैस एक विशेष उपकरण लगाया जाएगा, जो पटरियों की स्थिति पर लगातार नजर रखेगा। इसमें इस्तेमाल होने वाला ग्राउंड पेनिट्रेशन रडार ट्रैक के नीचे की परतों का भी परीक्षण कर सकेगा, जिससे समय रहते संभावित खतरे का पता लगाया जा सकेगा।
इसके अलावा पटरियों की वेल्डिंग की गुणवत्ता को और बेहतर बनाने के लिए मैग्नेटिक पार्टिकल टेस्टिंग तकनीक अपनाने का फैसला लिया गया है। यह तकनीक वेल्डिंग के बेहद सूक्ष्म दोषों को भी पहचानने में सक्षम मानी जाती है, जिससे ट्रैक की मजबूती और सुरक्षा दोनों बढ़ेंगी।
रेलवे के इन नए फैसलों को यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाजनक यात्रा के लिए उठाए गए अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है। तकनीक और नई सामग्री के इस्तेमाल से भारतीय रेलवे अब ट्रैक सुरक्षा के मामले में एक नई दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है।
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