इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने गाजियाबाद (Ghaziabad) की सिविल अदालत के जज के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए 13 मई 2025 का फैसला रद्द किया। प्रॉपर्टी विवाद में किरायेदार को मालिकाना हक देने पर कोर्ट ने इसे ‘दिनदहाड़े न्यायिक हत्या’ बताया और प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश की।
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इलाहाबाद
एक संपत्ति विवाद ने अदालत की दहलीज पर ऐसा मोड़ लिया कि शब्द भी कांप उठे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद की सिविल अदालत के एक जज के फैसले को न सिर्फ पलटा, बल्कि उसे ‘दिनदहाड़े न्यायिक हत्या’ तक करार दिया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप जैन की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही थी। पीठ ने कहा—निचली अदालत का निर्णय केवल त्रुटिपूर्ण नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया गंभीर न्यायिक कदाचार है। अदालत की टिप्पणी साफ थी: महत्वपूर्ण साक्ष्यों को दरकिनार कर एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
क्या था विवाद?
प्रकरण गाजियाबाद की एक विवादित संपत्ति से जुड़ा है। निचली अदालत ने एक किरायेदार—इंद्र मोहन सचदेव—के आवेदन पर आदेश देते हुए नगर निगम को निर्देश दिया था कि उसे संपत्ति का स्वामी दर्ज किया जाए। आधार बनाया गया मई 2022 के एक पूर्व निर्णय को, जिसमें कथित तौर पर उसके पक्ष में आदेश पारित हुआ था। लेकिन नगर निगम ने उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि:
- आवेदक ने तथ्यों को छिपाकर मुकदमा दायर किया,
- संपत्ति पहले से विवादित है,
- निगम के रिकॉर्ड में वह “मुरागा खाना” के रूप में दर्ज है,
- और केवल टैक्स भुगतान से मालिकाना हक साबित नहीं होता।
हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने उस महिला का मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे अहम साक्ष्य को नजरअंदाज किया, जिसके नाम पर संपत्ति दर्ज थी। पीठ ने कहा—यह साधारण चूक नहीं लगती, बल्कि या तो बाहरी दबाव में या फिर गंभीर अक्षमता के कारण ऐसा हुआ है।
कोर्ट ने दो टूक कहा:
- सिर्फ मकान टैक्स भरने से कोई मालिक नहीं बन जाता।
- नगर निगम के रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना भी स्वतः मालिकाना हक सिद्ध नहीं करता।
- किरायेदार लंबे समय तक रहने के आधार पर मालिक होने का दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने यह भी माना कि पहले का जिस फैसले पर भरोसा किया गया, वह स्वयं त्रुटिपूर्ण था। ऐसे निर्णय को आधार बनाकर राहत देना कानून की समझदारी के विपरीत है।
बड़ा कदम: प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश
हाई कोर्ट ने 13 मई 2025 के आदेश को रद्द करते हुए फाइल मुख्य न्यायाधीश को भेजने का निर्देश दिया, ताकि संबंधित जज के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई पर विचार किया जा सके।
पीठ की टिप्पणी में स्पष्ट असंतोष झलकता है—’कानून का खुलेआम उल्लंघन हुआ है और न्याय से वंचित किया गया है।’
यह फैसला सिर्फ एक संपत्ति विवाद का अंत नहीं, बल्कि न्यायिक जवाबदेही पर भी एक कड़ा संदेश माना जा रहा है—कि अदालत की कुर्सी पर बैठकर की गई हर चूक ‘निर्णय’ नहीं होती, कभी-कभी वह न्याय व्यवस्था पर गहरा सवाल भी बन जाती है।
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