पंजाब नेशनल बैंक (Punjab National Bank) के अधिकारी पी.के. वरुण को 37 साल की सेवा के बाद रिटायरमेंट के दिन बर्खास्त कर दिया गया। दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने सवाल उठाया कि एक ही मामले में सबसे कड़ी सजा सिर्फ उन्हें क्यों दी गई।
नई दिल्ली
37 साल तक बैंक की सेवा करने वाले एक अधिकारी को रिटायरमेंट वाले ही दिन नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। मामला अब अदालत तक पहुंचा तो सवाल खड़े हो गए। दिल्ली हाईकोर्ट ने पूछा—जब उसी मामले में दूसरे अधिकारियों को हल्की सजा मिली, तो आखिर सबसे कठोर कार्रवाई सिर्फ एक अधिकारी पर ही क्यों?
मामला पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के अधिकारी पी.के. वरुण से जुड़ा है। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजीव नरुला ने बैंक से जवाब मांगा कि सजा में इतना बड़ा अंतर किस आधार पर किया गया।
डॉलर पर RBI का ‘सर्जिकल वार’ | बैंकों को अतिरिक्त डॉलर बेचने होंगे, रुपये में दिख सकती
रिटायरमेंट के दिन ही झटका
पी.के. वरुण ने दिसंबर 1980 में बैंक जॉइन किया था। तीन दशक से ज्यादा सेवा देने के बाद 31 अक्टूबर 2017 को उनका रिटायरमेंट होना था। लेकिन उसी दिन अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने उन्हें बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया। इस फैसले का सीधा असर उनके रिटायरमेंट लाभों पर पड़ा—
- पेंशन रोक दी गई
- लीव एनकैशमेंट रोक दिया गया
- ग्रेच्युटी का अतिरिक्त हिस्सा रोक लिया गया
उन्हें केवल Payment of Gratuity Act के तहत मिलने वाली बेसिक ग्रेच्युटी ही दी गई।
मामला आखिर है क्या
PNB के अनुसार मई 2012 से अप्रैल 2015 के बीच मुंबई में एडिशनल जनरल मैनेजर (AGM) के रूप में काम करते हुए वरुण पर आरोप लगा कि उन्होंने पांच उधारकर्ताओं के खातों में क्रेडिट मंजूरी के दौरान जरूरी सावधानी नहीं बरती।
बैंक का दावा है कि इन खातों में गड़बड़ियों के कारण लगभग ₹31.84 करोड़ का संभावित एक्सपोजर पैदा हुआ।
लेकिन अदालत ने उठाया अहम सवाल
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने 25 मार्च के आदेश में कहा कि अगर एक ही क्रेडिट चेन से जुड़े कई अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है तो यह बताना जरूरी है कि एक अधिकारी को सबसे कड़ी सजा क्यों दी गई जबकि अन्य को हल्की सजा दी गई।
अदालत ने कहा कि
- सजा एक जैसी होना जरूरी नहीं
- लेकिन उसके पीछे तर्कसंगत कारण होना चाहिए
जस्टिस नरुला ने टिप्पणी की कि न्यायालय तभी हस्तक्षेप करेगा जब सजा इतनी ज्यादा हो कि वह ‘न्यायिक विवेक को झकझोर दे।’
विभागीय जांच पर कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय जांच को दोबारा ट्रायल की तरह नहीं देखा जा सकता। अदालत सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करती, बल्कि यह देखती है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया न्यायसंगत और वैध थी या नहीं।
कोर्ट ने माना कि जांच के दौरान अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था, इसलिए कदाचार के निष्कर्ष को पूरी तरह रद्द नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
अदालत ने
- बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया
- लेकिन कदाचार के निष्कर्ष बरकरार रखे
साथ ही बैंक को निर्देश दिया कि सजा पर दोबारा विचार किया जाए और यह बताया जाए कि उसी मामले में अन्य अधिकारियों के मुकाबले अलग कार्रवाई क्यों की गई।
6 हफ्तों में देना होगा नया आदेश
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि
- 6 सप्ताह के भीतर नया, कारणों पर आधारित आदेश जारी किया जाए
- फैसला करते समय यह भी देखा जाए कि बर्खास्तगी रिटायरमेंट के आखिरी दिन दी गई थी, जिसका असर पेंशन और अन्य लाभों पर पड़ा।
यदि सजा में बदलाव होता है तो रिटायरमेंट लाभों का फिर से निर्धारण किया जाएगा।
नई हवा खबरें अपने मोबाइल पर नियमित और डायरेक्ट प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप नंबर 9460426838 सेव करें और ‘Hi’ और अपना नाम, स्टेट और सिटी लिखकर मैसेज करें। आप अपनी खबर या रचना भी इस नंबर पर भेज सकते हैं।
अब पोस्टिंग जहां, वहीं से मिलेगा होम लोन | सरकार ने कर्मचारियों के लिए लॉन्च किया ‘गृह सुगम’ पोर्टल
‘नई हवा’ की खबरों को Subscribe करने के लिए हमारे WhatsApp Channel से जुड़ें।
