राजस्थान में शिक्षकों ने सरकार और शिक्षा विभाग के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। अवकाश कटौती, पदोन्नति, स्थानांतरण और गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर शिक्षकों में भारी नाराजगी है।
जयपुर
राजस्थान में शिक्षकों का गुस्सा अब खुलकर सड़क पर आने वाला है। लंबे समय से मांगों और समस्याओं को लेकर सरकार व शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संवाद कर रहे अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने आखिरकार आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर सरकार और विभागीय अधिकारी नहीं चेते तो प्रदेशभर में बड़ा उग्र आंदोलन होगा।
रविवार को जयपुर में प्रदेश अध्यक्ष रमेश चंद्र पुष्करणा के नेतृत्व में आयोजित प्रेस वार्ता में महासंघ ने सरकार और शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर जमकर हमला बोला। संगठन का आरोप है कि दो साल से ज्यादा समय बीतने के बावजूद शिक्षकों की प्रमुख समस्याएं जस की तस पड़ी हैं और अधिकारी “नवाचार” के नाम पर शिक्षा व्यवस्था को प्रयोगशाला बनाकर बैठे हैं।
महासंघ के प्रदेश महामंत्री महेंद्र कुमार लखारा ने कहा कि सरकार से लगातार वार्ता के बावजूद शिक्षकों की मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। शिविरा पंचांग में संशोधन, तृतीय श्रेणी शिक्षकों के स्थानांतरण, पदोन्नति, विद्यालयों में स्टाफिंग पैटर्न लागू करने, वेतन विसंगतियां दूर करने और संविदा शिक्षकों को नियमित करने जैसे मुद्दे अब भी अधर में लटके हुए हैं।
’35 दिन की छुट्टी और 60 दिन का तर्क’
सबसे ज्यादा नाराजगी ग्रीष्मकालीन अवकाश में कटौती को लेकर दिखाई दी। महासंघ ने सवाल उठाया कि जब उच्च शिक्षा संस्थानों, केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में 56 से 61 दिन तक की छुट्टियां दी जा रही हैं, तो राजस्थान के माध्यमिक और प्रारंभिक विद्यालयों में गर्मी की छुट्टियां घटाकर सिर्फ 35 दिन क्यों कर दी गईं?
संगठन का आरोप है कि अधिकारियों ने भौगोलिक परिस्थितियों की अनदेखी कर ऐसा फैसला लिया, जबकि राजस्थान की भीषण गर्मी किसी से छिपी नहीं है।
सरकार ने दिया तोहफा, अफसरों ने बना दिया अभिशाप
शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर भी महासंघ ने तीखा हमला बोला। संगठन का कहना है कि सरकार ने समयबद्ध पदोन्नति देकर राहत देने की कोशिश की, लेकिन अधिकारियों की जिद और मनमानी ने पूरी प्रक्रिया बिगाड़ दी।
गृह जिलों में पद खाली होने के बावजूद शिक्षकों को दूसरे जिलों में भेजा जा रहा है। काउंसलिंग में 125 प्रतिशत पद दिखाने के निर्देशों के बावजूद कई विषयों में सिर्फ 100 प्रतिशत पद खोलकर शिक्षकों के साथ अन्याय किया गया।
विद्यालय अपग्रेड हुए, लेकिन शिक्षक गायब
महासंघ ने आरोप लगाया कि प्रदेश में कई विद्यालयों को क्रमोन्नत तो कर दिया गया, लेकिन वहां पदों की वित्तीय स्वीकृति ही जारी नहीं की गई। हालात ऐसे हैं कि स्कूल का बोर्ड ‘उच्च माध्यमिक’ का लग गया, लेकिन शिक्षक अब भी प्राथमिक स्तर के भी पूरे नहीं हैं। तृतीय श्रेणी शिक्षकों के स्थानांतरण वर्षों से अटके पड़े हैं और पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं। संगठन का कहना है कि विभागीय नीतियों की वजह से कई मामले अदालतों में फंसे हुए हैं।
शिक्षक पढ़ाएं या ऑनलाइन हाजरी और जनगणना करें?
महासंघ ने गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर भी सरकार को घेरा। संगठन के मुताबिक शिक्षकों को लगातार ऐसे कामों में लगाया जा रहा है, जिनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।
जनगणना ड्यूटी से लेकर ऑनलाइन पोर्टल और ऐप के दबाव तक, शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा प्रशासनिक कामों में उलझे हुए हैं। कई स्कूलों में सभी शिक्षकों को जनगणना में लगा दिया गया, यहां तक कि एकल शिक्षक विद्यालय भी नहीं छोड़े गए।
अब ये होगा आंदोलन का रोडमैप
महासंघ ने आंदोलन का पूरा कैलेंडर भी घोषित कर दिया है—
- 14 मई : खंड स्तर पर प्रदर्शन
- 29 मई : जिला स्तर पर धरना
- 5 जून : बीकानेर निदेशालय पर संभाग स्तरीय प्रदर्शन
- 10 जून : जयपुर संभाग पर धरना-प्रदर्शन
- 18 जून से : प्रदेश स्तरीय क्रमिक धरना
- मानसून सत्र में विधानसभा घेराव
संघर्ष समिति के संयोजक सम्पत सिंह ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने जल्द समाधान नहीं निकाला तो प्रदेशभर के शिक्षक सड़कों पर उतरेंगे और इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार और शिक्षा विभाग के अधिकारियों की होगी।
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