राजस्थान के साक्षरता तंत्र में करोड़ों का स्कैम सामने आया है। स्कैम उपार्जित अवकाश में बड़ी अनियमितता, 45 दिन की फर्जी ड्यूटी, राजनीतिक नियुक्ति और साक्षरता सर्वे के दुरुपयोग को लेकर है।
जयपुर
राजस्थान के साक्षरता तंत्र पर वर्षों से दबे आरोप पहली बार इतने धमाकेदार तरीके से सामने आए हैं। स्कैम इतना बड़ा कि पूरे सिस्टम की नींव हिला दे। जिसे सुनते ही आम आदमी भी चौंक उठे। राज पंचायतीराज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष प्रकाश विश्नोई खारा राजस्थान के साक्षरता तंत्र को लेकर वर्षों से दबे-छिपे इस स्कैम को सामने लेकर आए हैं। उन्होंने जिस तरह के गंभीर सवाल उठाए हैं उसने पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। खारा ने दावा किया है कि राज्य में उपार्जित अवकाश (PL) के नाम पर “संगठित तरीके से” व्यापक अनियमितताएँ हो रही हैं।
खारा के बयान के मुताबिक हर ब्लॉक में औसतन 50 लाख रुपये की PL एंट्री होती है, जिसका कुल मिलाकर 400 ब्लॉक में अनुमानित योग 200 करोड़ रुपये तक पहुँचता दिखता है। खारा ने सवाल किया—“अगर ग्रीष्मकालीन अवकाश में हर साल यही खेल चलता है, तो आखिर यह पैसा कहाँ जाता है?”
45 दिन लगातार ड्यूटी—न रविवार, न त्यौहार, न घर से बाहर!
बयान में सबसे चौंकाने वाला उल्लेख जैसलमेर ब्लॉक का है। खारा के अनुसार—
- ग्रीष्मकालीन अवकाश में 80 शिक्षकों को ‘उल्लास सर्वे’ में 45 दिन लगातार ड्यूटी दिखा दी गई।
- किसी ने एक भी रविवार की छुट्टी नहीं ली।
- किसी ने न शादी-ब्याह में हिस्सा लिया, न एक दिन शहर से बाहर गया।
- और इस “अटूट ड्यूटी रिकॉर्ड” के आधार पर CBEO ने 15 PL स्वीकृत कर दी।
खारा ने कहा कि ऐसे आदेश कई ब्लॉकों में उपलब्ध हैं, जिन्हें कोई भी संबंधित अधिकारी से प्राप्त कर सकता है।
राजनीतिक नियुक्तियों पर सीधा आरोप
शिक्षक नेता के बयान का दूसरा बड़ा हिस्सा साक्षरता विभाग की नियुक्तियों पर केंद्रित है। उनके अनुसार—
- 41 जिला साक्षरता अधिकारी और 401 ब्लॉक कॉर्डिनेटर बिना परीक्षा व इंटरव्यू के सीधे राजनीतिक सिफारिशों पर लगाए जाते हैं।
- कई जिलों में दो-दो जिला साक्षरता अधिकारी बैठने के उदाहरण भी उन्होंने बताए।
- इन पदों पर लाखों का मासिक वेतन खर्च होता है, लेकिन “जमीनी स्तर पर साक्षरता का काम कहीं नजर नहीं आता।”
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में विभाग में अल्पसंख्यक वर्ग का एक भी अधिकारी नहीं है, जबकि पिछली सरकार में ऐसे उदाहरण थे।
स्कूलों में ब्लैकबोर्ड नहीं, पानी नहीं… पर साक्षरता का कागज़ी साम्राज्य चमक रहा है
बयान में स्कूलों की वास्तविक स्थिति पर भी सवाल उठाया गया है। खारा के अनुसार—
- जर्जर स्कूल, टूटी इमारतें, ब्लैकबोर्ड व पानी की कमी—सब वास्तविक समस्याएँ हैं।
- वहीं दूसरी तरफ साक्षरता कार्यालयों में फर्जी सर्वे, फर्जी परीक्षा, फर्जी बिल और फर्जी हाज़िरी का चक्र चल रहा है।
- “30,000 के किट में 5,000 की सामग्री मिलती है—बाकी कागज़ में उड़ जाती है।”
सबसे गंभीर सवाल: ड्यूटी बांटी जाती है… या बेची जाती है?
प्रकाश विश्नोई ने आरोप लगाया कि कई जगहों पर साक्षरता सर्वे की ड्यूटी “बांटने के बजाय बेची जाती है”, और उपार्जित अवकाश बनाने में “प्रतिशत का खेल” चलता है। उन्होंने यह भी कहा कि—
- 18 से 35 साल के ‘निरक्षरों’ की सूचियां हर साल बनती हैं, पर उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
- अगर देश में निरक्षर हमे दिखाई ही नहीं देते, तो ये सूचियां किसके लिए बन रही हैं?
ACB जांच और सिस्टम की समीक्षा की मांग
अपने बयान के अंत में खारा ने मांग की कि—
- ACB को स्वतः संज्ञान लेकर PL/उपार्जित अवकाश प्रकरण में मुकदमे दर्ज करने चाहिए।
- हर जिले में सर्वे सूचियों का सामाजिक अंकेक्षण हो।
- जिला साक्षरता अधिकारी और ब्लॉक कॉर्डिनेटर को दूरस्थ/सीमा क्षेत्रों की स्कूलों में भेजकर पुनः शिक्षण कार्य में लगाया जाए।
उनका कहना है कि अगर साक्षरता विभाग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा, तो इसे समीक्षा के दायरे में लाना ही होगा।
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