तुमको खोला श्रृंगार शतक सा
आता यथार्थ फन फैलाए ,जीवन का भार न सह पाए
है दंभ बहुत मुझको – तुझको, दिखती खामी सब औरों की
सम्बन्धों के मधुर गीत, आखिर कैसे गाते
थे धर्मराज, खेला करते जुआ
ज़िन्दगी, तू मुझे हँसना सिखा, मुश्किलों से बचना नहीं
कैसे कोई कर सकता है बेटियों का दान?
फिर कैसे कहते हो…
मौसम की तरह बदलना मेरी फितरत नहीं
मत रोको इन नादानों को बड़े प्रेम से बहने दो, ये तो निर्मल जल गंगा है…