त्रय शतक…

तुमको खोला
श्रृंगार शतक सा

सपने अलबेले होते हैं…

आता यथार्थ फन फैलाए ,जीवन का भार न सह पाए

हो पुरुषार्थ प्रखर…

है दंभ बहुत मुझको – तुझको, दिखती खामी सब औरों की

आखिर कैसे गाते…

सम्बन्धों के मधुर गीत, आखिर कैसे गाते

थे धर्मराज…

थे धर्मराज, खेला करते जुआ

सीख…

ज़िन्दगी, तू मुझे हँसना सिखा, मुश्किलों से बचना नहीं

अनमोल बेटियां…

कैसे कोई कर सकता है बेटियों का दान?

फिर कैसे कहते हो…

फिर कैसे कहते हो…

जीवन के मोड़…

मौसम की तरह बदलना मेरी फितरत नहीं

निर्मल बचपन…

मत रोको इन नादानों को बड़े प्रेम से बहने दो, ये तो निर्मल जल गंगा है…