यथार्थ
डॉ.सत्यदेव आज़ाद
आता यथार्थ फन फैलाए
जीवन का भार न सह पाए
ऐसा अस्तित्व किधर जाए
कब तक आँसू पीता जाए
तब नींद निलय में मौन
मुखर वैभव के मेले होते हैं।
सपने अलबेले होते हैं
पति प्रेयसी तब रूस गई
प्रिय जाने कब तक आयेंगे
द्वार का दीपक नहीं जला
घर के अभाव कब जाएँगे
सपनों में सबके समाधान
अभिराम सुनहले होते हैं।
सपने अलबेले होते हैं
सपनों में जी तो लेते हैं
जग के आगे हंस लेते हैं
सांसों को ढो कर किसी रूप
चुपचाप जहर पी लेते हैं।
सपनों में भी ये हतभागी
हर बार अकेले होते हैं।
सपने अलबेले होते हैं
(2313, अर्जुनपुरा, डीग गेट, मथुरा (उत्तर प्रदेश)। लेखक आकाशवाणी के सेवानिवृत्त वरिष्ठ उद्घोषक और नारी चेतना और बालबोध मासिक पत्रिका ‘वामांगी’ के प्रधान संपादक हैं)
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