फिर कैसे कहते हो…

फिर कैसे कहते हो…

जीवन के मोड़…

मौसम की तरह बदलना मेरी फितरत नहीं

निर्मल बचपन…

मत रोको इन नादानों को बड़े प्रेम से बहने दो, ये तो निर्मल जल गंगा है…

स्त्री मन की व्यथा…

मायके आई जब पुत्री नव विवाहित…

पिता देवदूत का साया सा होते…

पिता देवदूत का साया से होते…

जिंदगी ऐसे ही गुजर जाएगी…

जिंदगी ऐसे ही गुजर जाएगी…

भांति भांति के लोग…

उस दिन कोविड वैक्सीन की दूसरी डोज़ लगवाने, स्कूल से ही दोनों शिक्षक, सुरेश जी और रामनाथ जी साथ – साथ ही अस्पताल चले गए। सुरेश जी को…

क्या पाया कितना छूट गया…

जीवन की आपाधापी में,क्या पाया कितना छूट गया…

रिश्तों की धरोहर…

कविता  डॉ. विनीता राठौड़ विपदा की घड़ी कैसी है आईसाथ में महामारी बड़ी है लाई संपूर्ण  जगत  खड़ा  है  आजकलवर्तमान और भविष्य के दोराहे पर देख कर ऐसी विकट परिस्थिति…

जीवों से सीखो

अपने बचपन में सीखी थी,, यह सुन्दर कविता…