रिसते घाव
डॉ. सत्यदेव आजाद, मथुरा
मेरी सारी वांछित देह लांछनों कीदहकती सलाखों से दागी हुई है
कई बार नहाया हूँसामाजिक क्रांति की रक्त सरिता मेंफिर भीउन कीट युक्त घावों कोशांति न मिली
दरपन मन टूक टूक हो गया…
ये रिसते घावभीतरी उज्जवलता कोनिष्णात न कर देंमैं यही चौकसी करते हुएखड़ा हूँभीड़ भरे बाज़ार मेंबन करप्रतिमा पत्थर की
धवल बर्फ बरसता हैशिशिर मेंधूल की परतों नेढक लिया हैमेरे अनावरण को
आदमी अब खूब रोता है…
जब मानव क्रूर बनता है प्रकृति का हृदयपिघलता हैदया से।
(लेखक आकाशवाणी के सेवानिवृत्त वरिष्ठ उद्घोषक और नारी चेतना और बालबोध मासिक पत्रिका ‘वामांगी’ के प्रधान संपादक हैं।)
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