दिल्ली हाईकोर्ट ने 6,290 दिनों की देरी से दायर अपील बहाली की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पुराने वकील से संपर्क टूटना इतनी लंबी देरी का पर्याप्त आधार नहीं है।
नई दिल्ली। किसी मुकदमे में वकील से संपर्क टूट जाना क्या सालों तक कानूनी कदम न उठाने की वजह बन सकता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में 6,290 दिनों यानी 17 साल से ज्यादा की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि मुकदमा लड़ने वाले व्यक्ति की अपने मामले को आगे बढ़ाने की स्वतंत्र जिम्मेदारी होती है और वह वर्षों की निष्क्रियता का पूरा ठीकरा पुराने वकील पर नहीं डाल सकता।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की अदालत के सामने मामला एक ऐसी अपील की बहाली से जुड़ा था, जो वर्ष 2002 में सुनवाई आगे न बढ़ने यानी Non-Prosecution के कारण खारिज हो गई थी। अपीलकर्ता ने करीब 16 साल से अधिक समय बाद उसे फिर से बहाल कराने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने इतनी लंबी देरी के पीछे दिए गए कारणों को पर्याप्त नहीं माना।
1988 में अपील, 2002 में खारिज और फिर 16 साल तक कोई कदम नहीं
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मामले की शुरुआत वर्ष 1988 में हुई, जब अपील स्वीकार की गई थी। इसके बाद इसे 18 जुलाई और 25 जुलाई 2002 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। दोनों मौकों पर न तो अपीलकर्ता अदालत में मौजूद था और न ही उसका वकील पेश हुआ। इसके बाद अपील सुनवाई आगे न बढ़ने के कारण खारिज कर दी गई।
इसके बावजूद अपीलकर्ता ने लंबे समय तक इस मामले को दोबारा आगे बढ़ाने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। आखिरकार 24 नवंबर 2018 को अपील बहाल करने की मांग वाली अर्जी दाखिल की गई। आपत्तियां दूर करने के बाद इसे जनवरी 2019 में दोबारा दाखिल किया गया।
वकील से संपर्क टूटना, आर्थिक परेशानी… लेकिन कोर्ट नहीं माना
अपीलकर्ता की ओर से देरी की वजह बताते हुए कहा गया कि उसका पुराने वकील से संपर्क टूट गया था। इसके अलावा उसने आर्थिक कठिनाइयों और अपील खारिज होने से पहले नोटिस नहीं मिलने की बात भी कही। लेकिन हाईकोर्ट को ये वजहें 6,290 दिनों की असाधारण देरी को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं लगीं। अदालत ने माना कि किसी मुकदमे को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल वकील की नहीं होती। मुकदमा करने वाले व्यक्ति को खुद भी अपने मामले की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और समय पर कानूनी कदम उठाने चाहिए।
16 साल की खामोशी पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात को ध्यान में रखा कि अपील खारिज होने के बाद अपीलकर्ता ने 16 साल से अधिक समय तक कोई कदम नहीं उठाया। अदालत के मुताबिक, इतनी लंबी निष्क्रियता को केवल व्यक्तिगत परेशानी या पुराने वकील से बातचीत बंद हो जाने जैसी सामान्य दलीलों से उचित नहीं ठहराया जा सकता।अदालत ने कहा कि मुकदमा करने वाले की अपने मामले को तत्परता से आगे बढ़ाने की स्वतंत्र जिम्मेदारी है और वह अपने पुराने वकील पर पूरी जिम्मेदारी नहीं डाल सकता। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के रवैये को अपने कानूनी उपायों को आगे बढ़ाने के प्रति लापरवाही भरा रवैया माना।
6,290 दिन की देरी पर नहीं मिली राहत
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इतनी लंबी देरी के लिए कोई पर्याप्त कारण सामने नहीं आया है। इसलिए 6,290 दिनों की देरी को माफ करने का कोई आधार नहीं बनता और अपील बहाल करने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी गई।
इस फैसले में कोर्ट ने एक अहम बात स्पष्ट की कि वकील पर निर्भरता का मतलब यह नहीं है कि मुकदमा करने वाला व्यक्ति अपने मामले से पूरी तरह बेखबर रह सकता है। वर्षों तक कानूनी कार्रवाई न करने के लिए पर्याप्त और ठोस वजह बताना जरूरी है।
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