जयपुर के एसएमएस अस्पताल में दीपावली पर पटाखों से होने वाले नुकसान के जागरूकता पोस्टर को लेकर वरिष्ठ डॉक्टरों के वाट्सएप ग्रुप में धार्मिक बहस छिड़ गई। हिंदू त्योहारों को निशाना बनाने पर उठे सवाल।
जयपुर। दीपावली से पहले पटाखों के शोर से होने वाले नुकसान को लेकर शुरू हुई एक जनजागरूकता मुहिम राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस में धार्मिक बहस का मुद्दा बन गई। कानों की सुरक्षा का संदेश देने के लिए तैयार किए गए एक पोस्टर ने डॉक्टरों के बीच ऐसी बहस छेड़ दी कि बात दीपावली पर पटाखे चलाने से आगे बढ़कर हिंदू त्योहारों को निशाना बनाए जाने के सवाल तक पहुंच गई। अस्पताल के सीनियर फैकल्टी डॉक्टरों के आधिकारिक वाट्सएप ग्रुप में ही दो अलग-अलग विचार आमने-सामने आ गए। किसी ने इसे अच्छी पहल बताया तो किसी ने सवाल उठाया कि आखिर हिंदू पर्वों के दौरान ही पर्यावरण, प्रदूषण और जीवों को होने वाले नुकसान की चिंता इतनी मुखर क्यों हो जाती है?
विवाद की शुरुआत एसएमएस अस्पताल के ईएनटी विभाग की ओर से तैयार किए गए एक जागरूकता पोस्टर से हुई। इसमें पटाखों के तेज शोर से कानों को होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक के आयोजन का निमंत्रण दिया गया था। ईएनटी विभाग की एचओडी डॉ. रेखा हर्षवर्धन ने यह पोस्टर मेडिकल टीचर्स के आधिकारिक वाट्सएप ग्रुप में साझा किया। इसके बाद ग्रुप में प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।
प्रिंसिपल ने बताया अच्छी पहल, तो प्रोफेसर ने पूछ लिया सवाल
पोस्टर पर सबसे पहले सकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई। विभाग के प्रोफेसर और आरयूएचएस के प्रिंसिपल डॉ. मोहनीश ग्रोवर ने इसे अच्छी पहल बताते हुए बधाई दी। लेकिन इसके बाद नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं यूनिट हेड डॉ. धनंजय अग्रवाल ने सवाल उठाते हुए लिखा कि आखिर कुछ लोगों को दीपावली जैसे विशेष त्योहार पर ही दर्द क्यों होता है और इसके पीछे उनका मकसद क्या है?
‘हर हिंदू त्योहार को ही क्यों बनाया जाता है निशाना?’
बहस ने उस समय और तीखा रुख ले लिया, जब जेके लॉन हॉस्पिटल के रिटायर्ड शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रामबाबू शर्मा ने त्योहारों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सवाल उठाया कि हर धर्म में जश्न मनाने के अपने तरीके हैं, लेकिन हिंदू त्योहारों के दौरान ही आपत्तियां क्यों उठाई जाती हैं? उन्होंने धार्मिक आयोजनों में पशुहत्या का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि दूसरे मौकों पर होने वाली ऐसी गतिविधियों के खिलाफ भी इसी तरह आवाज क्यों नहीं उठाई जाती? मुस्लिम हस्तियां अहिंसा का संदेश देने के लिए आगे क्यों नहीं आतीं?
डॉ. शर्मा यहीं नहीं रुके। उन्होंने रूस-यूक्रेन और इजरायल-हमास संघर्ष के साथ अमेरिका-ईरान तथा सऊदी-हूती विवादों का हवाला देते हुए युद्धों में लगातार होने वाली मिसाइल और रॉकेट फायरिंग का जिक्र किया। उनका सवाल था कि जब युद्धों में लगातार विस्फोट और फायरिंग होती है, तब पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर ऐसी चर्चा क्यों नहीं होती, लेकिन दीपावली आते ही ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर पिघलने और कुत्तों को मानसिक आघात पहुंचने जैसी चिंताएं सामने आने लगती हैं?
सीनियर यूरोलॉजिस्ट भी बहस में कूदे, त्योहार मनाने की आजादी का उठाया मुद्दा
इस बहस में सीनियर यूरोलॉजिस्ट एवं सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉ. नचिकेत व्यास ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने डॉ. रामबाबू शर्मा की बात का समर्थन करते हुए लिखा कि क्या सभी लोग अपने काम से काम नहीं रख सकते और दूसरों को अपनी इच्छानुसार त्योहार मनाने की आजादी नहीं होनी चाहिए?
‘बीमार लोगों का ध्यान भी जरूरी, लेकिन त्योहारों का उत्साह भी बना रहे’
वहीं, डॉक्टर वंदना मंगल ने लिखा कि हर व्यक्ति उचित सम्मान का हकदार है और चिकित्सीय बीमारियों से जूझ रहे लोगों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने साथ ही कहा कि त्योहार रोजमर्रा की जिंदगी से सुखद बदलाव लेकर आते हैं और उन्हें पारंपरिक उत्साह के साथ मनाने में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। उन्होंने दीपावली को उसकी सच्ची भावना के साथ मनाने और शहर को दीयों से रोशन कर प्रभु राम का स्वागत करने का संदेश भी दिया।
‘दीपावली कभी पटाखों का त्योहार नहीं रही’
एसएमएस की सीनियर सर्जन डॉ. ओमप्रभा ने इस बहस में एक अलग पक्ष रखा। उन्होंने लिखा कि दीपावली कभी पटाखों का त्योहार नहीं रही, बल्कि यह रोशनी, मिठाइयों और भाईचारे का पवित्र उत्सव रहा है।
इस तरह कानों को तेज आवाज से बचाने के उद्देश्य से शुरू हुई एक सामान्य जनजागरूकता पहल ने एसएमएस के वरिष्ठ डॉक्टरों के बीच त्योहारों, धार्मिक भावनाओं, पर्यावरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बड़ी बहस का रूप ले लिया। अब इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही बनकर उभरा है कि क्या पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता सभी त्योहारों और आयोजनों के लिए एक समान होनी चाहिए, या फिर दीपावली जैसे हिंदू पर्वों पर ही ये सवाल ज्यादा मुखर होकर सामने आते हैं?
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