सरकारी कर्मचारी रिटायरमेंट से पहले बदल लें फैसला तो क्या होगा? राजस्थान हाईकोर्ट ने बताया नियमों का अहम पहलू

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले तारीख बढ़ाने की अर्जी पर सरकार को विचार करना होगा। जानें कर्मचारियों के लिए फैसले के अहम पहलू।

जयपुर। सरकारी नौकरी में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का फैसला लेने के बाद अगर कर्मचारी की मंशा बदल जाए, तो क्या वह निर्धारित तारीख से पहले अपनी अर्जी वापस लेने या सेवानिवृत्ति टालने का अनुरोध कर सकता है? और यदि कर्मचारी समय रहते ऐसा अनुरोध कर दे, तो क्या सरकार उसे नजरअंदाज करके सेवानिवृत्त कर सकती है? राजस्थान हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने इन सवालों पर अहम कानूनी पहलू स्पष्ट किया है।

अदालत ने माना कि सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले कर्मचारी तारीख बढ़ाने का अनुरोध करता है, तो सक्षम प्राधिकारी को उस पर विचार करना चाहिए। हालांकि, फैसले में कर्मचारियों के लिए एक दूसरा महत्वपूर्ण सबक भी सामने आया है—अदालत में केवल अपने साथ हुई कार्रवाई को गलत बताना पर्याप्त नहीं, बल्कि जिस राहत की मांग की जा रही है, उसे याचिका में स्पष्ट रूप से शामिल करना भी जरूरी है।

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रिटायरमेंट से पहले बदल जाए मन, तो सरकार की क्या जिम्मेदारी?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह मामला राजस्थान सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग में सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी रहे एच.के. मीणा से जुड़ा था। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी थी। सरकार ने उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 31 जुलाई 2014 से बढ़ाकर 31 अक्टूबर 2014 कर दी। इसके बाद मीणा ने 29 अक्टूबर 2014 को स्वास्थ्य में सुधार का हवाला देते हुए सेवानिवृत्ति की तारीख छह महीने और आगे बढ़ाने का अनुरोध किया। लेकिन सरकार ने 30 अक्टूबर को उनकी मांग अस्वीकार कर दी और अगले दिन उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्त कर दिया।

मीणा ने सेवानिवृत्ति आदेश वापस लेने के लिए भी आवेदन दिया, लेकिन सरकार ने उस पर निर्णय नहीं लिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो विवाद का महत्वपूर्ण बिंदु यही बना कि कर्मचारी ने सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले अपनी मंशा जाहिर कर दी थी, फिर भी उसके अनुरोध पर विचार नहीं किया गया।

नियमों में अलग प्रक्रिया नहीं, फिर भी अर्जी को अनदेखा नहीं कर सकते

हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 50 का विश्लेषण किया। नियम के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए सामान्यतः कम से कम तीन महीने का लिखित नोटिस और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है। अदालत ने माना कि सेवानिवृत्ति की तारीख बढ़ाने के लिए नियमों में अलग से स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है, लेकिन इससे कर्मचारी के ऐसे अनुरोध पर विचार करने का रास्ता बंद नहीं हो जाता। खंडपीठ के अनुसार, जब कर्मचारी ने सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले ही तारीख बढ़ाने का अनुरोध कर दिया था, तब सरकार उसकी अर्जी पर विचार किए बिना सेवानिवृत्ति का आदेश पारित नहीं कर सकती थी।

कर्मचारियों के लिहाज से फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यही है: सेवानिवृत्ति की तारीख आने से पहले अपनी मंशा बदलने का अनुरोध करने पर संबंधित प्राधिकारी को उस पर विचार करना चाहिए। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कर्मचारी का अनुरोध स्वतः स्वीकार करना अनिवार्य है।

सेवानिवृत्ति आदेश रद्द हुआ, लेकिन बहाली क्यों नहीं मिली?

मामले में एकलपीठ ने 25 जनवरी 2017 को मीणा का सेवानिवृत्ति आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह में उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया था। इसके बाद कर्मचारी और राज्य सरकार, दोनों ने अलग-अलग अपीलें दायर कीं। मीणा सेवा में निरंतरता और अन्य परिणामी लाभ चाहते थे, जबकि राज्य सरकार ने बहाली के आदेश को चुनौती दी।

खंडपीठ ने अपीलों की सुनवाई में पाया कि मीणा ने अपनी मूल याचिका में सेवानिवृत्ति आदेश रद्द करने और अपने आवेदन पर विचार करने की मांग तो की थी, लेकिन सेवा में बहाली की स्पष्ट मांग नहीं की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में जिस राहत की मांग नहीं की गई, वह राहत इस मामले में नहीं दी जा सकती। इसलिए एकलपीठ का बहाली संबंधी निर्देश निरस्त कर दिया गया, जबकि 30 अक्टूबर 2014 के सेवानिवृत्ति आदेश को रद्द करने का फैसला बरकरार रखा गया।

यानी कर्मचारी के पक्ष में सेवानिवृत्ति आदेश निरस्त होने के बावजूद उसे बहाली का लाभ नहीं मिला। अदालत ने सेवानिवृत्ति आदेश रद्द होने से मिलने वाले अन्य लाभों के लिए उसकी पात्रता बरकरार रखी, लेकिन बहाली का आदेश नहीं दिया।

सरकारी कर्मचारियों के लिए फैसले से निकलते हैं दो अहम सबक

इस फैसले को केवल एक कर्मचारी के सेवा विवाद के रूप में देखने के बजाय दो व्यावहारिक पहलुओं से समझना जरूरी है।

  • पहला: यदि कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले अपनी तारीख बढ़ाने या अपना अनुरोध वापस लेने की मांग करता है, तो सक्षम प्राधिकारी को उस पर विचार करना चाहिए। इस मामले में हाईकोर्ट ने सरकार की ओर से अनुरोध पर विचार किए बिना सेवानिवृत्ति का आदेश पारित करने को सही नहीं माना।

  • दूसरा: यदि कर्मचारी अदालत में चुनौती देता है, तो उसे अपनी याचिका में मांगी जाने वाली राहत स्पष्ट रूप से लिखनी चाहिए। इस मामले में बहाली की मांग स्पष्ट रूप से नहीं किए जाने के कारण बहाली का आदेश टिक नहीं सका।

इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि सभी परिस्थितियों में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति वापस ली जा सकती है या हर कर्मचारी को बहाली का अधिकार मिल जाएगा। राहत संबंधित नियमों, मामले की परिस्थितियों और अदालत के सामने रखी गई मांगों पर निर्भर करेगी।

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश में इसी सीमा तक संशोधन किया और दोनों अपीलों का निस्तारण करते हुए पक्षकारों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया।

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