‘डरपोक जज कहलाना मंजूर नहीं, मरना पसंद करूंगा’, माफिया के दबाव के बीच जज ने सुनाई नदीम को फांसी

मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर ने दहेज हत्या के दोषी नदीम को फांसी की सजा सुनाई। फैसले में कथित माफिया दबाव और धमकी का जिक्र करते हुए कहा- डरपोक जज कहलाना मंजूर नहीं।

मुजफ्फरनगर। ‘मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलाना पसंद नहीं करूंगा।’ यह किसी फिल्म का संवाद नहीं, बल्कि मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के उस फैसले का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने दहेज हत्या के दोषी नदीम को फांसी की सजा सुनाई है।

नदीम पर अपनी पत्नी 23 वर्षीय शहजादी को जिंदा जलाकर मारने का दोष साबित हुआ। करीब आठ साल पुराने इस मामले में फैसला सुनाते हुए जज दिवाकर ने न केवल अपराध की गंभीरता पर टिप्पणी की, बल्कि न्यायपालिका पर बाहुबलियों और अपराधियों के कथित दबाव को लेकर भी बेहद सख्त शब्दों में अपनी बात रखी।

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‘सिद्धांतों पर चलूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा’

जज दिवाकर ने अपने फैसले में लिखा कि उन्हें पश्चिमी यूपी के एक माफिया/गैंगस्टर की ओर से संदेश भिजवाया गया कि अभी केवल पत्रावलियां हटवाई गई हैं और अगर वह उनके पीछे पड़े तो उनका कोर्ट बदलवा दिया जाएगा या जिले से बाहर ट्रांसफर करवा दिया जाएगा।

इसके बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वे अपने सिद्धांतों पर चलते हुए न्याय कर सकते हैं, तब तक सेवा में रहेंगे। यदि उन्हें डर के साये में काम करना पड़े तो त्यागपत्र देना बेहतर समझेंगे। उन्होंने लिखा कि उनके माता-पिता ने उन्हें भगवान के अलावा किसी अन्य से न डरने की सीख दी है।

गवाहों के बयान बदले, फिर भी फांसी तक पहुंचा फैसला

शाहपुर कस्बे में घरेलू विवाद के दौरान शहजादी को जिंदा जलाने के मामले में अभियोजन पक्ष के कुछ गवाहों, जिसमें वादी के पिता भी शामिल थे, के बयान बदलने के बावजूद अदालत ने मजिस्ट्रेट के सामने शहजादी द्वारा मृत्यु से पहले दिए गए बयान को महत्वपूर्ण आधार माना। इसी आधार पर नदीम को हत्या का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई।

फैसले में जज दिवाकर ने टिप्पणी की कि एक अबला महिला को जिंदा जलाने वाला व्यक्ति सहानुभूति का हकदार नहीं है। अदालत ने नदीम पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

पांच महीने में 10 मामलों में 23 को फांसी

रवि कुमार दिवाकर के नाम न्यायिक सेवा में फांसी की सजाओं का लंबा रिकॉर्ड भी है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक 17 साल की न्यायिक सेवा में वह अलग-अलग गंभीर अपराधों में दोषी 36 अपराधियों को मौत की सजा सुना चुके हैं। मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर करीब पांच महीने की अवधि में उन्होंने 10 चर्चित मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।

करीब 100 मुकदमे दूसरी अदालतों में भेजे गए

इसी दौरान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की ओर से उनकी अदालत से करीब 100 मुकदमों को रिकॉल कर दूसरे न्यायालयों में ट्रांसफर किए जाने का भी जिक्र सामने आया है। जज रवि कुमार दिवाकर ने 29 नवंबर 2025 को मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश का कार्यभार संभाला था।

‘न्यायपालिका का भरोसा कमजोर होगा’

अपने फैसले में जज दिवाकर ने न्यायाधीशों पर बाहरी दबाव के असर को लेकर भी गंभीर बात कही। उनका कहना है कि यदि न्यायाधीश बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों के दबाव में फैसले लेने लगें तो जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर होगा।

उनके फैसले में दर्ज यह रुख इस मामले को सिर्फ एक दहेज हत्या की सजा तक सीमित नहीं रखता। एक तरफ जिंदा जलाई गई युवती के लिए मौत की सजा का फैसला है, तो दूसरी तरफ उस न्यायाधीश का दावा है कि उन्हें फैसले प्रभावित करने के लिए कथित तौर पर दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ा।

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