1981 के दोहरे हत्याकांड का मामला करीब 45 साल तक अदालतों में चलता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने लंबित आपराधिक अपीलों पर चिंता जताई और 70 वर्षीय आरोपी को रिहाई का आदेश दिया।
नई दिल्ली। 1981 में हुआ दोहरा हत्याकांड, 1991 में आरोप तय, 2002 में ट्रायल कोर्ट का फैसला और 2024 में हाईकोर्ट का निर्णय… लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। सजा के खिलाफ अपील लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत के सामने सिर्फ हत्या का अपराध नहीं, बल्कि करीब 45 साल तक खिंची न्यायिक प्रक्रिया का सवाल भी खड़ा हो गया।
साइमन सोरेन की अपील पर सुनवाई कर रही जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपीलों के लंबित मामलों को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने हाईकोर्ट से मांगी गई रिपोर्ट देखने के बाद लंबित आपराधिक अपीलों की स्थिति को ‘चौंकाने वाली’ बताया।
22 साल ट्रायल में, फिर 22 साल अपील में
मामले की शुरुआत 1981 के दोहरे हत्याकांड से हुई। छह लोग आरोपी बनाए गए थे। इनमें से दो की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई। बाकी चार के खिलाफ कार्यवाही आगे बढ़ी।
1991 में आरोप तय हुए, लेकिन ट्रायल पूरा होने में करीब 11-12 साल और लग गए। आखिरकार 2002 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया। इसके बाद सजा को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील हाईकोर्ट पहुंची और वहां भी करीब 22 साल तक मामला लंबित रहा।
झारखंड हाईकोर्ट ने आखिरकार 2024 में अपील पर फैसला सुनाया। लेकिन तब तक इस मुकदमे की तस्वीर ही बदल चुकी थी। दोषी ठहराए गए चार आरोपियों में से तीन की अपील लंबित रहने के दौरान मौत हो गई। अब करीब 70 साल के साइमन सोरेन ही अकेले जीवित आरोपी बचे हैं।
हाईकोर्ट की रिपोर्ट ने भी उठाए कई सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी कि एक आपराधिक मामले को ट्रायल और अपील के स्तर तक पहुंचने में इतना लंबा समय क्यों लगा।
रजिस्ट्रार की ओर से दाखिल हलफनामे में ट्रायल में देरी की एक वजह आरोपियों का करीब छह साल तक फरार रहना बताई गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यहां एक अहम सवाल उठाया—जब 1991 में आरोप तय हो चुके थे, तो उसके बाद ट्रायल पूरा होने में लगे करीब 12 साल की देरी का स्पष्ट कारण क्या था?
जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि 1991 के बाद करीब 11 साल के दौरान मामला पांच बार अलग-अलग ट्रायल कोर्ट में ट्रांसफर हुआ।
यही बिंदु सुप्रीम कोर्ट की चिंता का बड़ा कारण बना। अदालत ने माना कि किसी आपराधिक मामले में इतनी लंबी देरी केवल एक व्यक्ति के मुकदमे को प्रभावित नहीं करती, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
45 साल बाद आरोपी को मिली अंतरिम राहत
सुप्रीम कोर्ट के सामने एक तरफ दोहरे हत्याकांड की गंभीरता थी, तो दूसरी तरफ करीब 45 साल से चल रही कानूनी लड़ाई और आरोपी की मौजूदा स्थिति।
सोरेन करीब दो साल चार महीने और 12 दिन हिरासत में रह चुके हैं। उनकी उम्र लगभग 70 साल है और अदालत के सामने उनकी स्वास्थ्य संबंधी स्थिति का भी उल्लेख हुआ। राज्य के हलफनामे में हिरासत के दौरान अस्पताल में भर्ती कराए जाने की बात भी सामने आई।
बेंच ने साफ किया कि अपराध की गंभीरता अपनी जगह है, लेकिन पिछले साढ़े चार दशकों में आरोपी ने जो परिस्थितियां झेली हैं, उन्हें भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उनकी सजा पर रोक लगाते हुए तुरंत रिहाई का आदेश दिया। उन्हें व्यक्तिगत जमानत देनी होगी और जमानत पर रहते हुए कोई नया अपराध नहीं करने का वचन भी देना होगा।
अब केंद्र सरकार भी इस मामले में पक्षकार
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों की स्थिति को लेकर चिंता के कारण भारत सरकार को भी कार्यवाही में पक्ष बनाने की अनुमति दी है।
अदालत ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल अनुपालन शपथ-पत्र की प्रति अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय तक पहुंचाने का निर्देश दिया है।
साथ ही मूल केस रिकॉर्ड भी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट से मंगाए गए हैं। इन्हें भौतिक और डिजिटल, दोनों स्वरूपों में चार सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने को कहा गया है। इसके बाद डिजिटल रिकॉर्ड संबंधित वकीलों को भी उपलब्ध कराया जाएगा।
एक मुकदमा, चार दशक और बदल गई पूरी तस्वीर
इस मामले की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ यह नहीं है कि 1981 के हत्याकांड में आरोपी कौन था या फैसला क्या हुआ। असली सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे में न्याय मिलने तक कितनी पीढ़ियां गुजर सकती हैं।
जब मुकदमा शुरू हुआ था, तब आरोपी की उम्र आज से करीब चार दशक कम थी। ट्रायल खत्म होने तक 22 साल बीत चुके थे। हाईकोर्ट की अपील का फैसला आने तक एक और लंबा दौर गुजर गया। इस बीच तीन दोषियों की मौत हो गई और अब अंतिम जीवित आरोपी करीब 70 वर्ष की उम्र में सुप्रीम कोर्ट के सामने है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी लंबी देरी को न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय माना है। मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर 2026 को होगी।
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