वैर नगरपालिका चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा और कांग्रेस ने तैयारियां शुरू कर दी हैं, जबकि निर्दलीय दावेदार भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की तैयारी में हैं।
वैर। नगरपालिका चुनाव की तारीख भले ही अभी पूरी तरह चुनावी शोर में तब्दील नहीं हुई हो, लेकिन वैर में सियासी हलचल ने रफ्तार पकड़ ली है। गलियों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि इस बार नगर पालिका की कमान किस खेमे के हाथ जाएगी।
भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी-अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी बैठकों में दावेदारों को लेकर मंथन चल रहा है और संभावित प्रत्याशी भी अपने स्तर पर वार्डों में संपर्क बढ़ाने लगे हैं। इसी बीच निर्दलीय उम्मीदवारों की संभावित मौजूदगी ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
इस बार अध्यक्ष पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। आरक्षण की घोषणा के साथ ही सामान्य वर्ग से महिला दावेदारों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। अब पार्टियों के सामने केवल पार्षद जिताने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि वार्डों में ऐसा समीकरण बनाने की कवायद भी होगी जिससे अध्यक्ष पद पर अपने खेमे का प्रत्याशी मजबूत स्थिति में पहुंच सके।
पिछली पालिका का कामकाज भी बनेगा चुनावी मुद्दा
वैर में इस बार चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी का मुकाबला नहीं रहने वाला। पिछले पांच साल में वार्डों में हुए काम और पार्षदों की सक्रियता भी मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बन रही है।
स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि चुनाव जीतने के बाद पार्षदों ने अपने-अपने वार्ड की समस्याओं को कितनी गंभीरता से उठाया। कुछ वार्डों के लोगों का कहना है कि सड़क, सफाई, नाली और दूसरी मूलभूत जरूरतों को लेकर उन्हें कई बार खुद प्रयास करने पड़े। यही नाराजगी अब चुनावी माहौल में पुराने पार्षदों और नए दावेदारों दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।
चुनाव आते ही फिर शुरू हुआ घर-घर पहुंचने का दौर
पांच साल के अंतराल के बाद एक बार फिर वार्डों में संभावित प्रत्याशियों की आवाजाही बढ़ने लगी है। मतदाताओं से मुलाकात, समर्थन मांगने और अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। स्थानीय चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या चुनाव के समय किए जाने वाले वादे अगले पांच साल तक दिखाई देंगे?
यही वजह है कि इस बार मतदाताओं के सामने सिर्फ उम्मीदवार चुनने का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करने की चुनौती भी है कि उनके वार्ड की समस्याओं को लगातार उठाने और नगरपालिका तक पहुंचाने वाला प्रतिनिधि कौन हो सकता है।
मिठाई और लालच नहीं, पांच साल का हिसाब देखना होगा
चुनावी माहौल में मतदाताओं के बीच एक अपील भी जोर पकड़ रही है कि किसी भी तरह के प्रलोभन से प्रभावित होकर वोट देने के बजाय प्रत्याशी के पिछले काम, व्यवहार और वार्ड के प्रति उसकी उपलब्धता को देखा जाए।
स्थानीय लोगों के बीच यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव के दौरान मिलने वाले छोटे-छोटे फायदे कुछ समय के लिए आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन गलत प्रतिनिधि का चुनाव पूरे पांच साल के विकास को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए इस बार असली मुकाबला केवल भाजपा बनाम कांग्रेस बनाम निर्दलीय नहीं है। असली सवाल यह भी है कि मतदाता पार्टी और व्यक्तिगत संपर्क से ऊपर उठकर अपने वार्ड के लिए किसे चुनते हैं।
वैर के चुनावी मैदान में अभी कई चेहरे सामने आना बाकी हैं। लेकिन इतना तय है कि जैसे-जैसे टिकट के दावेदारों की तस्वीर साफ होगी, वैसे-वैसे मुकाबले की गर्मी भी बढ़ेगी। इस बार अध्यक्ष पद का आरक्षण और पिछले कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड—दोनों ही चुनावी नतीजों की दिशा तय करने वाले बड़े मुद्दे बन सकते हैं।
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