नई दिल्ली
मध्य प्रदेश में एक महिला जज के यौन उत्पीड़न के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई तो सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए निचली अदालतों में भी महिला जज के पास तो कोई उचित मंच ही नहीं है। कोर्ट्स में सिर्फ कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कमेटी बनी हुई है। जजों के लिए ऐसा कोई स्थाई इंतजाम नहीं है।
इंदिरा जयसिंह की इस दलील के बाद चीफ जस्टिस एनवी रमणा ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि वो घटना की डिटेल में रिपोर्ट भेजें।
आपको बता दें कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जिला अदालत में महिला जज ने अपने एक सीनियर पर दुर्भावना से काम करने और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सेवा से त्यागपत्र दे दिया था। हाईकोर्ट ने जांच के लिए दो जजों की कमेटी भी बनाई थी। लेकिन शिकायतकर्ता जज इससे असंतुष्ट दिखी तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पीड़ित महिला जज ने सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर अर्जी लगाई कि ऐसी घटना संज्ञान में आने के बाद इन हाउस जांच कमेटी बनाने और पारदर्शी जांच कराने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने महिला जज की बात सुनी तो दो जजों की कमेटी खारिज कर तीन जजों की नई कमेटी को जांच का जिम्मा सौंपा।
इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि उस कमेटी ने भी ना तो सबूत इकट्ठा किए ना ही बयान के आधार पर क्रॉस इक्जामिनेशन यानी सभी आरोपियों और मामले से जुड़े अन्य लोगों का आमना सामना और उनसे जिरह की। कमेटी ने कह दिया कि तथ्य पूरे और संतोषजनक नहीं थे।
‘यौन उत्पीड़न के आरोप गलत’
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शिकायतकर्ता की तरफ से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप गलत पाए गए हैं। उन्होंने कहा कि यौन उत्पीड़न की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर भानुमति, बॉम्बे हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस मंजुला चेल्लूर और बॉम्बे हाई कोर्ट के तब के ही सीनियर एडवोकेट और अब एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को मिलाकर एक कमेटी बनी थी। मेहता के मुताबिक, इस कमेटी ने साल 2017 नें राज्यसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। जिसमें आरोपी जज को निर्दोष बताया गया था।
मेहता ने कहा, “अगर कमेटी की रिपोर्ट्स पर नजर डालेंगे तो ऐसी दो रिपोर्ट पेश की गईं. जिनमें यौन उत्पीड़न की बात को नकार दिया गया. किसी महिला के खिलाफ यौन उत्पीड़न बहुत ही गंभीर अपराध होता है. और अगर इस तरह के आरोप गलत पाए जाते हैं, तो यह भी एक गंभीर मुद्दा है।”
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