सरकारी बैंक अधिकारियों को बड़ा झटका या राहत? PLI स्कीम पर सरकार ने लगाई रोक | 19 नवंबर 2024 की व्यवस्था अब ठंडे बस्ते में, नए फॉर्मूले पर यूनियनों से होगी बातचीत

सरकारी बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों की 19 नवंबर 2024 वाली PLI स्कीम को सरकार ने फिलहाल रोक दिया है। अब Bipartite Settlement और Joint Note के जरिए नए फॉर्मूले पर चर्चा होगी।

नई दिल्ली। सरकारी बैंकों के अधिकारियों से जुड़ी Performance Linked Incentive (PLI) Scheme को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बैंक कर्मचारी प्रतिनिधियों की बैठक के बाद 19 नवंबर 2024 को लागू की गई संशोधित PLI व्यवस्था को फिलहाल Abeyance यानी रोक दिया गया है।

इस फैसले का सीधा असर वित्त वर्ष 2025-26 के लिए इस PLI व्यवस्था के तहत होने वाले क्रियान्वयन पर पड़ेगा। अब इस योजना का नया स्वरूप द्विपक्षीय समझौते (Bipartite Settlement) और Joint Note के जरिए बातचीत से तय किए जाने की दिशा में रास्ता खुल गया है।

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आखिर PLI पर सरकार को क्यों लगानी पड़ी रोक?

दरअसल, 19 नवंबर 2024 को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए संशोधित PLI योजना शुरू की थी। यह व्यवस्था मुख्य रूप से वरिष्ठ अधिकारियों और Whole-Time Directors से संबंधित थी।

बैंक यूनियनें लंबे समय से इस व्यवस्था का विरोध कर रही थीं। उनका सबसे बड़ा सवाल था कि जब बैंक का प्रदर्शन पूरी टीम की मेहनत से बेहतर होता है तो इंसेंटिव का ढांचा कुछ संवर्गों तक सीमित क्यों रहे? यूनियनों ने PLI के फॉर्मूले को असमान और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे द्विपक्षीय बातचीत के जरिए तय करने की मांग की थी। हाल के महीनों में PLI को लेकर बैंक यूनियनों और सरकार के बीच टकराव भी बढ़ा था।

लक्ष्य पूरे करने का दबाव भी बना था बड़ा मुद्दा

यूनियनों की आपत्ति सिर्फ इंसेंटिव मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं थी। उनका तर्क था कि बैंक के वित्तीय प्रदर्शन, लाभ और NPA जैसे मानकों को PLI से जोड़ने पर शाखा और फील्ड स्तर के कर्मचारियों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शन का दबाव बढ़ता है।

यूनियनों का कहना था कि बैंक की उपलब्धियां किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरी बैंकिंग टीम की सामूहिक मेहनत का परिणाम होती हैं। इसलिए इंसेंटिव का ढांचा भी न्यायसंगत और व्यापक सहमति वाला होना चाहिए।

अब बंद कमरे में नहीं, बातचीत की मेज पर बनेगा नया फॉर्मूला

सरकार की ओर से मौजूदा व्यवस्था को रोकने के बाद अब PLI के भविष्य पर नजरें IBA यानी Indian Banks’ Association और बैंक यूनियनों के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत पर टिक गई हैं।

यही बातचीत यह तय कर सकती है कि आगे PLI किन अधिकारियों या कर्मचारियों पर लागू होगी, इसका फॉर्मूला क्या होगा और बैंक के प्रदर्शन के साथ कर्मचारियों के योगदान को किस तरह जोड़ा जाएगा।

बैंक यूनियनें पहले से ही संशोधित PLI को लेकर आपत्ति जताती रही हैं और इसे द्विपक्षीय चर्चा के जरिए बदलने की मांग करती रही हैं।

सिर्फ PLI नहीं, रिटायर्ड बैंककर्मियों के मुद्दे भी उठे

वित्त मंत्री के साथ बैठक में बैंक संगठनों ने सिर्फ PLI का मुद्दा नहीं उठाया। पूर्व बैंक कर्मचारियों के एक्स-ग्रेशिया की समीक्षा और सेवानिवृत्त बैंककर्मियों के लिए बेहतर मेडिकल इंश्योरेंस जैसी मांगें भी सामने रखी गईं। इन मुद्दों पर भी सरकार की ओर से कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विचार किए जाने का भरोसा दिया गया।

बैंक कर्मचारियों के लिए अब अगला बड़ा पड़ाव क्या?

PLI व्यवस्था पर फिलहाल रोक लगने के बाद असली तस्वीर आगामी द्विपक्षीय वार्ताओं में साफ होगी। यानी अभी यह तय नहीं है कि पुरानी व्यवस्था वापस आएगी या PLI का कोई नया मॉडल तैयार होगा।

दिलचस्प बात यह है कि PLI का मुद्दा ऐसे समय में उठा है जब बैंक यूनियनें 5-Day Banking समेत कई मांगों को लेकर सरकार और IBA पर दबाव बना रही हैं। UFBU ने सितंबर और अक्टूबर 2026 में आंदोलन और हड़तालों का कार्यक्रम भी घोषित किया है।

ऐसे में PLI पर सरकार का यह कदम बैंकिंग क्षेत्र में चल रही बातचीत को नई दिशा दे सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अगली PLI व्यवस्था में बैंक के हर स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों के योगदान को जगह मिलेगी, या फिर इंसेंटिव का बड़ा हिस्सा वरिष्ठ अधिकारियों तक ही सीमित रहेगा?

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