ज़िन्दगी कुछ तो दे मशवरा…

ऐ ज़िन्दगी क्यूं कर रही है परेशान,
राह ए हयात कुछ तो कर आसान

लिख ही गई दर्द से उपजी एक और रचना…

उन आँखों में बसा
घनघोर अँधेरा
छिपा हुआ था
मुस्कुराहट के

जनम जनम की प्रीत निभाएं

आया श्रावणी तीज का त्यौहार
मन में छाया हर्षोल्लास अपार

शब्द सो गए मौन ओढ़कर…

आवाज बांधकर
जंजीरों से
शब्द सो गए

पावस ॠतु

पावस ऋतु का पावन माह
मनभावन यह सावन माह
रिमझिम रिमझिम बरसाए मेह
चंहु ओर बिखराए नेह

काश! इन जख्मों को कोई चीख मिल पाती

पलकों की कोर से ढलकते
उस से पहले
रोक दिया उसने

धूप का इक नन्हा कतरा…

धूप का इक नन्हा कतरा
रोज सुबह
मेरे घर के अहाते में

मुझे अमन चाहिए…

मेरे शहर को ये क्या हो गया,
अमन ओ चैन का गुलिस्तां

समीक्षा: मन दर्पण

मन दर्पण में मन के विचारों की अनुभूति को प्रतिच्छादित करने का प्रयास स्तुत्य है। मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में निरुपित किया गया है। आत्मकथ्यात्मक शैली में

दर्शन…

भोर की प्रथम किरण,
धरा पर उतर रही।