सेवानिवृत्ति का सुख…

सरकारी सेवा से होकर निवृत्त
प्रभु भजन में अब होना है रत

केसू बड़े कमल के फूल मेरी झांझी ऐ ब्याहन आए

झांझी शब्द, सांझी का अपभ्रंश है या कि नहीं यह मेरे लिए यक्षप्रश्न है ? मेरा बचपन अटूट ब्रज संस्कृति से पोषित है । कल अमावस के अपराह्न, संध्या से पूर्व ही हमारे यहाॅं दीवार पर गाय के

कभी-कभी खुद से भी मिला करो…

कभी-कभी खुद से भी मिला करो
अपने दिल की भी सुन लिया करो

नाहक डर – डर कर यूं क्यूं जीना…

जाने भी दो यारो
नाहक डर -डर कर यूं क्यूं जीना
हरि इच्छा के बिना है असंभव

वो पिता ही है जो…

वो पिता ही है
जो सब कुछ सह जाता है।
तपती धूप में

 कब तक सिसकेगी मानवता…

मेहनतकश को है सज़ा यहां,
नाकारा इज्जत पाते हैं,
खुद का हक है सबको प्यारा

पुकार…

हे आशुतोष मुझे अपना लो
अपने जैसा मुझे बना लो

आज की लक्ष्मीबाई…

प्रातः काल जो धधक उठी थी,
क्रोध भरी चिंगारी थी।
मत पूछो वो कौन थी यारो

अपनी कब चली, पता ही नहीं चला…

कैसे कटा
21 से 60 तक का
यह सफ़र,
पता ही नहीं चला।

दौसा के अंजीव अंजुम को हिंदी संस्थान लखनऊ का कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान

दौसा के वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. अंजीव अंजुम को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा संचालित बाल साहित्य संवर्धन योजना के अंतर्गत राज्य के अन्य आठ बाल