अहमदाबाद
कोर्ट (Court) रूम में तंबाकू और पान मसाला खाने की आदत एक जज (judge) को भारी पड़ गई थी, लेकिन अब गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक गरिमा के खिलाफ यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इतनी बड़ी सजा जरूरी नहीं थी। हाईकोर्ट के इस फैसले से 15 साल पुराने इस विवादित मामले में जज को बड़ी राहत मिली है।
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क्या था पूरा मामला?
यह घटना 2007 से 2009 के बीच वडोदरा में तैनात सिविल जज और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी से जुड़ी है। उनके खिलाफ कुल 23 आरोप लगे थे, जिनमें कोर्ट स्टाफ के उत्पीड़न, पक्षपातपूर्ण रवैया और कोर्ट परिसर में अनुचित आचरण शामिल था। जांच में 14 आरोप आंशिक या पूर्ण रूप से सही पाए गए, लेकिन हाईकोर्ट ने इनमें से ज्यादातर को अपर्याप्त सबूतों के आधार पर खारिज कर दिया। केवल कोर्ट रूम में तंबाकू चबाने और एक वकील का पक्ष लेने के आरोप ही बरकरार रहे।
जांच के बाद अप्रैल 2012 में जज को निलंबित कर दिया गया और अगस्त 2016 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन जज ने हाईकोर्ट में अपील की, जहां मार्च 2024 में अदालत ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा बहुत कठोर है। हाई कोर्ट ने मार्च 2024 में अपना फैसला सुनाया और जनवरी 2025 में इस पर स्पष्टीकरण दिया। कोर्ट के सामने यह मामला 31 जनवरी, 2025 को फिर से लाया गया था। हाईकोर्ट के प्रशासनिक विभाग ने आदेश में बर्खास्तगी के बजाय समाप्ति शब्द के इस्तेमाल पर स्पष्टीकरण मांगा था। बेंच ने 31 जनवरी को कहा कि हमने अधिकारियों पर छोड़ दिया है कि वे नियमों के अनुसार बर्खास्तगी के अलावा कोई उचित सजा तय करें।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
गुजरात हाईकोर्ट की जस्टिस बीरेन वैष्णव और जस्टिस निशा ठाकोर की बेंच ने कहा—
“कोर्ट में तंबाकू, गुटखा या पान मसाला खाना निंदनीय है और न्यायिक अधिकारी की गरिमा के खिलाफ है। लेकिन यह इतना गंभीर मामला नहीं है कि किसी जज की नौकरी छीन ली जाए।”
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के बजाय कोई अन्य सजा देने का निर्देश दिया और मामले को कोर्ट प्रशासन पर छोड़ दिया कि वे उचित कार्रवाई करें।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब गुजरात न्यायिक प्रशासन को तय करना होगा कि संबंधित जज को कौन सी वैकल्पिक सजा दी जाए। इसमें वेतन कटौती, पदावनति (डिमोशन) या कोई अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। यह मामला भारतीय न्यायपालिका में अनुशासन और गरिमा को लेकर बड़ा संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को अपने व्यवहार में मर्यादा रखनी चाहिए, लेकिन मामूली अनुशासनहीनता के लिए किसी की पूरी नौकरी खत्म करना उचित नहीं। अब देखना होगा कि गुजरात हाईकोर्ट का प्रशासन इस जज पर कौन सी सजा तय करता है।
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