सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बैंक ‘प्रोफेशनल लापरवाही’ के आधार पर वकीलों को ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकते। देश में बनेगी राष्ट्रीय कानूनी अकादमी। पूरी खबर।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के हक में एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि बैंक और भारतीय बैंक संघ (IBA) किसी भी वकील को सिर्फ ‘पेशेवर लापरवाही’ (Professional Negligence) के आरोपों के आधार पर अपनी ‘सावधानी सूची’ (Caution List) या ब्लैकलिस्ट में नहीं डाल सकते।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कानूनी पेशे की आजादी और गरिमा को मजबूत करते हुए कहा कि वकीलों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करना पूरी तरह गलत है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वकील को ब्लैकलिस्ट करना सीधे तौर पर ‘बार काउंसिल’ के वैधानिक अनुशासनात्मक अधिकारों (Disciplinary Rights) का अतिक्रमण है।
एसएमएस मेडिकल कॉलेज में शोक: देश के जाने-माने फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. एन.एल. डिसानिया ने की खुदकुशी
देश में खुलेगी ‘राष्ट्रीय कानूनी अकादमी’, SC ने बार काउंसिल को दिए निर्देश
कानूनी क्षेत्र में गुणवत्ता और वकीलों के स्तर को और बेहतर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ा कदम उठाया है। जस्टिस नरसिम्हा ने अपने 41 पन्नों के विस्तृत फैसले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को एक खास निर्देश दिया है:
विशेषज्ञों की टीम का होगा गठन: BCI को वरिष्ठ और जूनियर वकीलों के साथ-साथ कानूनी शिक्षाविदों की एक हाई-लेवल टीम बनाने को कहा गया है।
नेशनल लीगल एकेडमी की तैयारी: यह टीम देश में ‘राष्ट्रीय कानूनी अकादमी’ (National Legal Academy – वकीलों के लिए विशेष ट्रेनिंग संस्थान) की स्थापना पर विचार-विमर्श करेगी और इसका पूरा खाका तैयार करेगी।
अदालत को देनी होगी रिपोर्ट: कोर्ट ने भरोसा जताया है कि BCI इस जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाएगा और जल्द ही अपने फैसले से अदालत को अवगत कराएगा।
EPFO का बड़ा बदलाव: अब PF से जुड़े काम होंगे आसान, देशभर में एक सिस्टम से मिलेगी सुविधा
बदल गए नियम: अब IBA के खिलाफ भी दायर हो सकेगी रिट याचिका
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 (Article 226) के तहत मिलने वाले ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के दायरे को भी और व्यापक कर दिया है।
अदालत ने एक बड़ा कानूनी सिद्धांत तय करते हुए कहा कि अब भारतीय बैंक संघ (IBA) के खिलाफ भी रिट याचिकाएं स्वीकार की जा सकती हैं। कोर्ट के मुताबिक, यह अधिकार अब सिर्फ उन वैधानिक प्राधिकरणों या सरकारी अंगों तक सीमित नहीं है जो अनुच्छेद 12 के दायरे में आते हैं। अदालत ने साफ किया कि ‘व्यक्ति या प्राधिकरण’ की परिभाषा को अब और अधिक उदार व व्यापक नजरिए से देखा जाएगा।
केस स्टडी: वकील अजय विझ के उस 10 साल पुराने मामले को समझें, जिस पर SC ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
यह पूरा विवाद साल 2015 से शुरू हुआ था, जिसने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में जाकर देश के सभी वकीलों के लिए एक बड़ी ढाल का रूप ले लिया। आइए जानते हैं कि वकील अजय विझ के साथ ऐसा क्या हुआ था:
10 साल पुराना वो विवाद: वकील अजय विझ साल 2010 से केनरा बैंक के पैनल में शामिल थे। साल 2015 में उन्होंने एक जमीन के मालिकाना हक को लेकर बैंक को ‘लीगल ओपिनियन’ (कानूनी राय) दी।
बैंक ने लगाया लापरवाही का आरोप: 3 साल बाद (2018 में) बैंक ने आरोप लगाया कि उस जमीन का एक हिस्सा पहले ही बिक चुका था और अजय विझ ने गलत कानूनी राय दी। वकील ने स्पष्टीकरण दिया कि उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड (सब-रजिस्ट्रार ऑफिस के सर्च सर्टिफिकेट) के आधार पर ही रिपोर्ट दी थी, लेकिन बैंक नहीं माना और उन्हें पैनल से हटा दिया।
IBA ने डाला कौशन लिस्ट में, छिन गई आजीविका: केनरा बैंक की शिकायत पर इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) ने फरवरी 2020 में अजय विझ का नाम ‘धोखाधड़ी में शामिल संस्थाएं’ वाली कौशन लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि दूसरे बैंकों ने भी उन्हें हटा दिया और उनका पूरा करियर दांव पर लग गया।
हाईकोर्ट ने नहीं सुनी गुहार: इसके खिलाफ अजय विझ जब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे, तो हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर दी कि IBA एक निजी संस्था है, इसलिए इसके खिलाफ ‘रिट याचिका’ दायर नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट के 3 बड़े चाबुक: जिससे पलटा पूरा मामला
अजय विझ जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तो अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए 3 सबसे महत्वपूर्ण बातें कहीं:
IBA के खिलाफ भी होगी सुनवाई: कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही IBA कोई सरकारी संस्था नहीं है, लेकिन उसका काम ‘पब्लिक ड्यूटी’ से जुड़ा है। उसकी ब्लैकलिस्ट से किसी वकील की आजीविका छिनती है, इसलिए उसके खिलाफ हाईकोर्ट में सीधे रिट याचिका (Article 226) दायर की जा सकती है।
आरबीआई के नियमों का गलत इस्तेमाल: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RBI की ‘कौशन लिस्ट’ सिर्फ धोखाधड़ी या आपराधिक मामलों के लिए है, न कि किसी वकील की कागजी जांच में हुई अनजानी चूक या ‘प्रोफेशनल लापरवाही’ के लिए।
एकतरफा फैसला अवैध: अदालत ने दोटूक कहा कि बैंक किसी वकील से नाराज होकर उसे अपने पैनल से हटा तो सकते हैं, लेकिन वे जज बनकर उसे पूरे देश में बदनाम या ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकते। वकीलों पर कार्रवाई का एकमात्र हक सिर्फ ‘बार काउंसिल’ के पास है।
नई हवा खबरें अपने मोबाइल पर नियमित और डायरेक्ट प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप नंबर 9460426838 सेव करें और ‘Hi’ और अपना नाम, स्टेट और सिटी लिखकर मैसेज करें। आप अपनी खबर या रचना भी इस नंबर पर भेज सकते हैं।
