इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों की पेशेवर फीस को अपराध की कमाई नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साइबर सेल संदिग्ध लेन-देन के नाम पर पूरे बैंक खाते को फ्रीज नहीं कर सकती।
प्रयागराज। अगर कोई वकील अपने मुवक्किल से पेशेवर फीस लेता है, तो सिर्फ इस आधार पर उसके बैंक खाते को फ्रीज नहीं किया जा सकता कि उस मुवक्किल पर धोखाधड़ी या किसी अपराध का आरोप है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि वकालत की फीस को ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ (अपराध की कमाई) नहीं माना जा सकता, इसलिए पुलिस बिना पर्याप्त आधार पूरे बैंक खाते को सील नहीं कर सकती।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस की साइबर सेल द्वारा एक अधिवक्ता का बैंक खाता फ्रीज किए जाने के मामले की सुनवाई के दौरान की।
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर मौत की आग | ट्रेलर में घुसी बस, 8 यात्रियों को जिंदा निगल गईं लपटें
वकील का खाता फ्रीज, कोर्ट पहुंचा मामला
मामला उस समय सामने आया जब एसबीआई की कृष्णा नगर शाखा, कानपुर ने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता आयुष बाजपेयी का बैंक खाता साइबर सेल के निर्देश पर कथित संदिग्ध लेन-देन के आरोप में फ्रीज कर दिया गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने खाते का रिकॉर्ड देखा तो पाया कि उसमें सामान्य बैंकिंग गतिविधियां ही थीं। रिकॉर्ड के अनुसार 18 मार्च 2026 को 20 हजार रुपये जमा हुए, जबकि 23 अप्रैल 2026 को 3,700 रुपये के तीन अलग-अलग क्रेडिट दर्ज थे। खाते में कुल जमा राशि 1,03,071 रुपये थी।
कोर्ट बोला- फीस अपराध की कमाई नहीं हो सकती
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि किसी आरोपी का मुकदमा लड़ना वकील का वैधानिक अधिकार और पेशेवर दायित्व है। यदि कोई आरोपी अपने अधिवक्ता को फीस देता है, तो उस राशि को अपराध से अर्जित धन नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि कोई वकील किसी बड़े घोटाले या साइबर धोखाधड़ी के आरोपी की भी पैरवी कर सकता है, लेकिन उसके द्वारा प्राप्त कानूनी फीस को ‘अपराध की कमाई’ नहीं कहा जा सकता। वह वकील की वैध पेशेवर आय है।
पूरे खाते पर नहीं लगा सकते रोक
हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना कानूनन उचित नहीं है। यदि किसी लेन-देन पर संदेह है तो केवल उतनी राशि या उसी हिस्से को रोका जा सकता है, जो कथित अपराध से जुड़ा हो।
न्याय व्यवस्था पर भी पड़ेगा असर
अदालत ने यह भी कहा कि यदि मामूली संदेह के आधार पर वकीलों के बैंक खाते फ्रीज किए जाने लगे, तो वे एडवोकेट्स एक्ट के तहत अपने पेशेवर दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं कर पाएंगे। इसका सीधा असर अदालतों के कामकाज और न्याय वितरण प्रणाली पर पड़ेगा।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई वकील स्वयं किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल पाया जाता है और उसके खाते में आया पैसा उसके अपने अपराध से जुड़ा है, तो स्थिति अलग होगी और कानून उसके खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देता है।
सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने मामले में उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को दो सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने पूछा है कि भविष्य में पुलिस वकीलों के बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया को किस तरह नियंत्रित करेगी, ताकि न्यायिक कार्य प्रभावित न हों।
साथ ही सभी पक्षों को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 तय की गई है। अदालत ने आदेश की प्रति संबंधित अधिकारियों, साइबर सेल और एसबीआई की कृष्णा नगर शाखा को भी भेजने के निर्देश दिए हैं।
नई हवा खबरें अपने मोबाइल पर नियमित और डायरेक्ट प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप नंबर 9460426838 सेव करें और ‘Hi’ और अपना नाम, स्टेट और सिटी लिखकर मैसेज करें। आप अपनी खबर या रचना भी इस नंबर पर भेज सकते हैं।
अब टोल प्लाजा पर नहीं लगेगा ब्रेक! | राजस्थान में एक और हाईवे पर शुरू हुई ‘बिना रुके टोल’ व्यवस्था
