यथार्थ को छैनी से स्वप्नों को काटा छाँटा नया रूप दिया नई काया बनाई फिर भी – समझ में नहीं आता आत्मा क्यों कुलबुलाती है रेंगते कीड़े की तरह खुशी भाग भाग जाती है
हो सकता है शायद- यही न कि मज्जा के कोमल स्वप्न बज्र बन कर कैसे सहें? हथौड़े की गहराई चोटें कैसे ठुकरा दें? दर्द की हमदर्दी कैसे भुला दें ? सान्त्वना आँसू की
तो फिर – थोथे पन के ताने बाने से बुने इन आदर्शों का हम क्या करें ?
(लेखक आकाशवाणी के सेवानिवृत्त वरिष्ठ उद्घोषक और नारी चेतना और बालबोध मासिक पत्रिका ‘वामांगी’ के प्रधान संपादक हैं)