डॉ. अलका अग्रवाल, सेवानिवृत्त कॉलेज प्राचार्य, जयपुर
मरुस्थल की तपती रेत पर,
दोपहर में नंगे पैर
चलना होता है।
दूर तक जहां नहीं दिखाई देती, कोई शीतल छांव।
दो बूंद पानी के लिए भी,
तरस जाता है मन।
ऐसा ही है जिंदगी का सफर,
चरैवेति,चरैवेति,
अंत नहीं होता यात्रा का।
लगता है जैसे,
कभी न समाप्त होने वाली, यात्रा है जीवन।
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