फैसला उसी जज का होगा | ट्रायल पूरा, बहस खत्म—ट्रांसफर से न्याय नहीं रुकेगा

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा कि आपराधिक मामलों में फाइनल बहस के बाद फैसला सुरक्षित होने पर वही जज फैसला सुनाएगा, भले ही उसका ट्रांसफर क्यों न हो जाए।

नई दिल्ली 

अदालत में जब फाइनल बहस पूरी हो जाए और फैसला सुरक्षित रख लिया जाए, तब आरोपी सिर्फ तारीख नहीं गिनता—वह हर दिन बेचैनी में काटता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी मानवीय सच्चाई को केंद्र में रखते हुए एक अहम फैसला सुनाया है, जो न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार तय करेगा बल्कि त्वरित न्याय की भावना को भी मजबूती देगा।

हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी आपराधिक मामले में यदि ट्रायल पूरा होने के बाद जज ने फाइनल बहस सुनकर फैसला सुरक्षित रख लिया है, तो वही जज फैसला सुनाएगा—भले ही उसका तबादला किसी दूसरी अदालत या जिले में क्यों न हो जाए। उस कुर्सी पर आने वाला उत्तराधिकारी जज न तो दोबारा फाइनल बहस के आदेश देगा और न ही मामले को नए सिरे से खोलेगा।

जस्टिस स्वर्णकांत शर्मा की पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जारी आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि ट्रांसफर के समय न्यायिक अधिकारियों को ऐसे सभी मामलों की जानकारी देनी होगी, जिनमें वे फाइनल बहस सुनकर फैसला सुरक्षित रख चुके हैं। ऐसे मामलों में उन्हें ट्रांसफर के बाद भी फैसला सुनाना होगा।

अदालत ने यह टिप्पणी एक मकोका (MCOCA) मामले में की, जहां आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आरोपी का कहना था कि 4 जुलाई 2025 को उसके मामले में फाइनल बहस पूरी हो चुकी थी और फैसला सुनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। 7 नवंबर 2025 को फैसला सुनाया जाना था, लेकिन आरोपी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ा होने के कारण अदालत ने अगली तारीख तय की और फिजिकल पेशी का निर्देश दिया। इसी बीच जज का ट्रांसफर हो गया और नए जज ने दोबारा फाइनल बहस के आदेश दे दिए।

हाई कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही न सिर्फ कानून की भावना के खिलाफ है, बल्कि इससे फैसले में अनावश्यक देरी होती है और अदालत का कीमती समय भी नष्ट होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार फाइनल बहस हो जाने के बाद दोबारा उसी प्रक्रिया को दोहराना त्वरित न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।

फैसले में एक संवेदनशील टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जेल में बंद आरोपी के लिए फैसला सुरक्षित रहने के बाद का हर दिन मानसिक दबाव और अनिश्चितता से भरा होता है। वह पहले ही फाइनल बहस की तनावपूर्ण प्रक्रिया से गुजर चुका होता है। ऐसे में दोबारा बहस कराना उसके लिए और अधिक पीड़ादायक हो सकता है।

अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून का पालन जरूरी है, लेकिन कानून के नाम पर वास्तविक और मानवीय न्याय को कुचल देना भी स्वीकार्य नहीं है। आपराधिक मामलों में अदालतों को प्रक्रिया के साथ-साथ इंसानी पहलुओं को भी बराबर महत्व देना चाहिए।

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