TMC में ‘महाभारत’ | 60 विधायक लेकर अलग हुए बागी, ममता ने पूरी पार्टी की कमेटियां ही भंग कर दीं

पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों के अलग गुट बनाने के दावे के बीच ममता बनर्जी ने पार्टी की सभी कमेटियां भंग कर दी हैं।

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कोलकाता 

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा भूचाल आया है, जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव तक हिला दी है। पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक बड़े बागी गुट ने अलग मोर्चा खोल दिया है। दावा किया जा रहा है कि 60 विधायक उनके साथ खड़े हैं। इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के सामने उनके अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक खड़ा कर दिया है।

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बागी खेमे के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को समर्थन पत्र सौंपकर उन्हें विधायक दल का नेता मान्यता देने की मांग की है। उनके अनुसार स्पीकर ने इस पर सहमति भी दे दी है, हालांकि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

बागी गुट ने अपनी समानांतर टीम भी घोषित कर दी है। जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता बनाया गया है, जबकि अखरुज्जमान को चीफ व्हिप की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दिलचस्प बात यह है कि बागी विधायक अब भी ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष मान रहे हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व और विधायक दल से जुड़े निर्णयों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर चुके हैं।

अपना हाथ जगन्नाथ …

पूरा विवाद उस समय भड़का जब नेता विपक्ष के चयन से जुड़े एक प्रस्ताव में कथित फर्जी हस्ताक्षरों का मामला सामने आया। आरोप है कि प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर उनकी अनुमति के बिना लगाए गए। इस मामले में शिकायत करने वाले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। दोनों नेताओं का आरोप है कि फर्जी हस्ताक्षर का मुद्दा उठाने की सजा उन्हें निष्कासन के रूप में मिली।

उधर बगावत की आहट तेज होते ही ममता बनर्जी ने बड़ा दांव चल दिया। उन्होंने राज्य की सभी पार्टी कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग करने का फैसला लिया है। माना जा रहा है कि यह कदम संगठन पर नियंत्रण बनाए रखने और संभावित टूट को रोकने की रणनीति का हिस्सा है। अब TMC पूरे संगठन के पुनर्गठन की तैयारी में जुट गई है।

हालांकि बागी विधायक नेता विपक्ष, उपनेता या चीफ व्हिप जैसे पदों पर दावा कर सकते हैं, लेकिन पार्टी पर अधिकार हासिल करना उनके लिए आसान नहीं होगा। यदि मामला शिवसेना और एनसीपी की तरह पार्टी के असली नियंत्रण तक पहुंचता है तो अंतिम फैसला चुनाव आयोग को करना पड़ सकता है। जरूरत पड़ने पर मामला अदालत तक भी जा सकता है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार दलबदल कानून और 91वें संविधान संशोधन के तहत यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक अलग होने का निर्णय लेते हैं तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद यह सवाल उठता है कि पार्टी पर वास्तविक नियंत्रण किसके पास है, जिसका परीक्षण चुनाव आयोग करता है।

फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह बगावत केवल विधायक दल तक सीमित रहेगी या फिर TMC के संगठनात्मक ढांचे में भी बड़ी दरार पैदा करेगी। आने वाले दिनों में ममता बनर्जी और बागी खेमे की अगली चालें पूरे देश की नजरों में रहेंगी।

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