भारतीय रेलवे (Indian Railways) का बड़ा फैसला—कर्मचारियों की अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा बेटियां माता-पिता के निधन के बाद भी इलाज और यात्रा पास का लाभ ले सकेंगी। नियमों में ऐतिहासिक बदलाव।
नई दिल्ली
भारतीय रेलवे ने कर्मचारियों से जुड़े नियमों में एक अहम संशोधन किया है। रेलवे बोर्ड (Railway Board) के ताज़ा निर्देशों के तहत अब कर्मचारी की अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा बेटियां माता-पिता के निधन के बाद भी रेलवे की स्वास्थ्य सेवाओं और यात्रा पास की सुविधा ले सकेंगी। यह व्यवस्था निर्भरता की शर्तें पूरी करने वाली बेटियों पर लागू होगी और इसके लिए अलग से कोई नया आवेदन नहीं करना होगा।
यानी अब रेलवे बोर्ड के ताजा आदेशों के बाद रेलवे कर्मचारी की अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा बेटियां माता-पिता के निधन के बाद भी सिस्टम से बाहर नहीं होंगी। इलाज, दवाइयां और यात्रा—तीनों पर उनका अधिकार बना रहेगा।
अब तक होता ये था कि कर्मचारी के निधन के बाद विधवा पत्नी को तो स्वास्थ्य सुविधा और विधवा पास मिलता था, लेकिन पत्नी के जाने के साथ ही पूरा लाभ वहीं खत्म हो जाता था। बेटियां, चाहे पूरी तरह आश्रित ही क्यों न हों, नियमों के बाहर हो जाती थीं।
रेलवे बोर्ड के नए स्पष्टीकरण ने इसी खामोश अन्याय पर ब्रेक लगा दिया है।
अब तस्वीर बदल गई है। निर्भरता की शर्तें पूरी करने वाली बेटियों को रेलवे अस्पतालों में मुफ्त इलाज, दवाइयां और सभी चिकित्सा सेवाएं मिलेंगी। उन्हें यूनिवर्सल मेडिकल आइडेंटिटी कार्ड (उम्मीद) भी प्राथमिकता के आधार पर जारी किया जाएगा। साफ शब्दों में—इलाज अब किसी रिश्ते की अवधि पर नहीं, पात्रता पर मिलेगा।
यात्रा नियमों में भी बड़ा मोड़ आया है। अब तक विधवा पास पत्नी के निधन के साथ समाप्त हो जाता था। नई व्यवस्था में यह पास परिवार की सबसे बड़ी पात्र बेटी के नाम ट्रांसफर होगा। इस पास के जरिए अन्य आश्रित सदस्य भी नियमों के अनुसार यात्रा कर सकेंगे। यानी बेटी अब सिर्फ नाम की वारिस नहीं, अधिकारों की भी उत्तराधिकारी होगी।
उत्तर मध्य रेलवे (एनसीआर) के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शशिकांत त्रिपाठी के मुताबिक यह सुविधा एनसीआर जोन में लागू कर दी गई है और इसका पालन सख्ती से किया जाएगा।
नार्थ सेंट्रल रेलवे मेंस यूनियन के महामंत्री आरडी यादव ने इसे कर्मचारियों के परिवारों की वर्षों पुरानी मांग बताया है।
रेलवे बोर्ड के हालिया सर्कुलर के तहत आरईएलएचएस-97 और पास नियमों को ज्यादा मानवीय बनाया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला सिर्फ सुविधा नहीं, एक संदेश है—कि बेटियां भी परिवार की स्थायी इकाई हैं, अस्थायी व्यवस्था नहीं।
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