OTS पर हाईकोर्ट का बड़ा झटका: सरकार का फैसला रद्द | कहा- सत्ता बदली है, वादा नहीं; अब पुराने प्लान पर ही बनेगा प्रोजेक्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर के OTS चौराहे परियोजना का कॉन्ट्रेक्ट रद्द करने और नई DPR बनाने के सरकारी फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने पुराने अनुबंध के अनुसार काम शुरू करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जांच के आदेश दिए।

जयपुर 

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राजस्थान की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के साथ कई योजनाओं की दिशा बदली, लेकिन जयपुर के ओटीएस चौराहे की बहुचर्चित परियोजना के मामले में हाईकोर्ट ने साफ संदेश दे दिया है कि सरकार बदलने का मतलब यह नहीं कि पुराने वैध अनुबंधों को कूड़ेदान में डाल दिया जाए।

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राजस्थान हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में भजनलाल सरकार के उस निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसके तहत ओटीएस चौराहे की परियोजना का अनुबंध रद्द कर नई डीपीआर बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। अदालत ने न केवल पुराने कॉन्ट्रेक्ट को बहाल किया, बल्कि जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को निर्देश दिया कि वह तत्काल प्रभाव से मूल अनुबंध के अनुसार काम शुरू कर निर्धारित समय में परियोजना पूरी करे।

यह मामला सिर्फ एक फ्लाईओवर या चौराहे का नहीं था, बल्कि उस सवाल का भी था कि क्या नई सरकारें पिछली सरकारों की घोषित परियोजनाओं को केवल राजनीतिक कारणों से रोक सकती हैं?

कोर्ट की दो टूक: राजनीतिक बदलाव संविदा तोड़ने का लाइसेंस नहीं

जस्टिस समीर जैन की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार और उसकी एजेंसियां निष्पक्ष, तर्कसंगत और जिम्मेदार तरीके से काम करने के लिए बाध्य हैं। वैध अनुबंधों को मनमाने तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता और सरकार अपने संविदात्मक दायित्वों से बच नहीं सकती।

अदालत ने यह भी माना कि परियोजना को रोकने और नई डीपीआर के लिए टेंडर निकालने का फैसला न केवल मनमाना था बल्कि इससे जनता के पैसे की बर्बादी और परियोजना लागत में अनावश्यक बढ़ोतरी होती।

क्या था पूरा मामला?

गहलोत सरकार ने बजट 2021-22 में जयपुर के व्यस्त ओटीएस चौराहे को सिग्नल-फ्री बनाने की घोषणा की थी। इसके लिए लगभग 184.30 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना तैयार की गई।

योजना के तहत केवल फ्लाईओवर ही नहीं, बल्कि हवा में झूलता हुआ पुल, ट्रैफिक आइलैंड, गोलचक्कर, अंडरग्राउंड आर्ट गैलरी, पेडेस्ट्रियन पाथवे, स्कल्पचर, फाउंटेन और आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जाना था।

जेडीए ने टेंडर प्रक्रिया पूरी कर 27 दिसंबर 2022 को जेसीएल इन्फ्रा प्राइवेट लिमिटेड के साथ अनुबंध किया था। कंपनी को 6 जनवरी 2023 से काम शुरू कर 5 जनवरी 2024 तक परियोजना पूरी करनी थी।

फिर क्यों रुका काम?

सरकार बदलने के बाद तस्वीर बदल गई। अप्रैल 2024 में जेडीए ने अनुबंध रद्द कर दिया और बाद में बैंक गारंटी भी लौटा दी। इसके बाद अप्रैल 2025 में नई डीपीआर तैयार करने के लिए टेंडर जारी कर दिए गए।

कंपनी ने अदालत में दावा किया कि उसने डिजाइन, ड्रॉइंग और संसाधनों की तैयारी पूरी कर ली थी, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई और जरूरी अनुमतियां भी समय पर नहीं मिलीं।

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह भी सामने आया कि परियोजना में देरी कंपनी की वजह से नहीं, बल्कि साइट संबंधी विवादों, प्रशासनिक अड़चनों और MNIT-OTS की आपत्तियों के कारण हुई थी।

अब अफसरों की भी होगी पड़ताल

फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह है, जिसमें अदालत ने मुख्य सचिव को पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट ने कहा है कि दो महीने के भीतर यह पता लगाया जाए कि निर्णय प्रक्रिया में किन अधिकारियों की भूमिका रही, देरी और अनुबंध रद्द करने के लिए कौन जिम्मेदार था और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जानी चाहिए।

यानी मामला अब सिर्फ ओटीएस चौराहे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन अफसरों तक भी पहुंच गया है जिनके फैसलों की वजह से करोड़ों रुपये की परियोजना वर्षों तक अटकी रही।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद जेडीए कितनी तेजी से काम शुरू करता है और क्या वास्तव में जयपुर का यह चर्चित चौराहा उस स्वरूप में विकसित हो पाता है, जिसकी घोषणा पांच साल पहले की गई थी।

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