बाधाएं कितनी भी आएं, कदम रुकने नहीं चाहिए। डॉ. अलका अग्रवाल की कविता संघर्ष, निर्भयता और लगातार आगे बढ़ते रहने का हौसला देती है।
फूलों की मुझको चाह नहीं
कांटों की कुछ परवाह नहीं।
कितनी भी आएं बाधाएं,
पर निकले मुख से आह नहीं।
ऐसे अवसर भी आएंगे,
जो मन विचलित कर जाएंगे।
निर्भय हो बढ़ते जाना है।
मुझको चढ़ते ही जाना है।
घबरा करके,बाधाओं से,
मैं करूं पलायन कभी नहीं।
बढ़ती जाऊं, हर पल पथ पर ,
थक पाऊं,मन से कभी नहीं।
दुर्गम को सुगम बनाना है
मुझको बढ़ते ही जाना है।
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