एक घोंसला, तीन नन्हे बच्चे और सुरक्षा की पूरी कोशिश… फिर ऐसा क्या हुआ कि आशियाना उजड़ गया? पढ़िए डॉ. यू.एस. जुरैल की भावुक कर देने वाली रचना।
सुबह की पहली किरण जैसे ही हमारे आँगन में उतरती, मेरी पत्नी सबसे पहले अपने छोटे-से बगीचे में चली जाती। पौधों से बातें करना, उन्हें सहलाना, सूखी पत्तियाँ हटाना और नई कलियों को देखकर मुस्कुराना—यही उसकी दिनचर्या थी। उस छोटे से बगीचे में लगा एक क्रिसमस ट्री मानो घर का सबसे प्रिय सदस्य था।
एक दिन देखा कि दो नन्हीं चिड़ियाँ उस पेड़ की डालियों पर फुदक रही थीं। वे बार-बार तिनके लातीं, उन्हें सजातीं और फिर उड़ जातीं। वे अपना घर बना रही थीं।
मेरे मन में एक पुरानी याद कौंध गई। कुछ समय पहले भी एक चिड़िया ने यहीं घोंसला बनाया था, लेकिन बंदरों ने उसे पूरा होने से पहले ही उजाड़ दिया था। उस दर्दनाक दृश्य ने मन पर गहरा असर छोड़ा था। इसलिए इस बार पहला विचार आया—घोंसला बनने ही मत दो।
लेकिन अगले ही पल मन ने कहा—
“अगर इन्हें हम पर भरोसा है, तो क्या हमें इनके भरोसे की रक्षा नहीं करनी चाहिए?”
बस, उसी क्षण मैंने निर्णय ले लिया। पूरे बगीचे के चारों ओर मजबूत लोहे का जाल लगवा दिया, ताकि कोई बंदर अंदर न आ सके।
दिन बीतते गए। चिड़िया का जोड़ा निश्चिंत होकर अपना घर बनाता रहा। एक-एक तिनका जोड़कर उन्होंने ऐसा सुंदर घोंसला बनाया कि उसे देखकर लगता था मानो प्रकृति स्वयं मुस्कुरा रही हो।
कुछ दिनों बाद उस घोंसले में तीन छोटे-छोटे अंडे दिखाई दिए।
अब घर का हर सदस्य उन अंडों का इंतज़ार करने लगा। दोनों चिड़ियाँ बारी-बारी से उन्हें सेतीं। तेज धूप हो, बारिश हो या रात की ठंडी हवा—वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए बिना थके डटी रहतीं।
इक्कीसवें दिन वह सुबह भी आ गई जिसका सभी को इंतज़ार था।
घोंसले से हल्की-सी चीं-चीं सुनाई दी।
तीन नन्हीं चोंचें, तीन मासूम चेहरे और जीवन की पहली पुकार…
ऐसा लगा जैसे पूरे बगीचे में खुशियों का जन्म हो गया हो।
मेरी पत्नी रोज़ दूर खड़ी होकर उन्हें निहारती। मैं भी कई बार बिना किसी कारण खिड़की से झाँक लेता। उन नन्हे बच्चों को देखकर मन अनायास ही प्रसन्न हो उठता था।
लेकिन शायद प्रकृति ने हमारी खुशी की उम्र बहुत छोटी लिखी थी।
सातवाँ दिन था।
दोपहर की खामोशी अचानक टूट गई।
एक बड़ी बंदरिया न जाने कैसे सारी सुरक्षा व्यवस्था पार करके बगीचे के भीतर आ गई। देखते ही देखते उसने पेड़ की डालियाँ हिलानी शुरू कर दीं। पौधे बिखरने लगे। फूल टूटकर ज़मीन पर गिरने लगे।
और फिर…
एक झटके में वह घोंसला भी नीचे आ गिरा।
तीनों नन्हे बच्चे, जिन्होंने अभी ठीक से पंख भी नहीं खोले थे, अचानक खुले आकाश के नीचे असहाय पड़े थे।
उनकी चीखें शायद आज भी मेरे कानों में गूँजती हैं।
मेरी पत्नी उन्हें बचाने दौड़ी, लेकिन बंदरिया ने उन्हें भी काट लिया। खून बह रहा था, बगीचा उजड़ चुका था और वे मासूम बच्चे अपना घर खो चुके थे।
उस दिन केवल घोंसला नहीं टूटा था…
कुछ मेरे भीतर भी टूट गया था।
रात देर तक मैं उसी क्रिसमस ट्री को देखता रहा। खाली डालियाँ जैसे मुझसे प्रश्न पूछ रही थीं।
क्या गलती मेरी थी?
क्या मुझे भावुक होकर उन्हें यहाँ घर बनाने ही नहीं देना चाहिए था?
या गलती उन चिड़ियों की थी, जिन्होंने इस बगीचे को अपना सुरक्षित संसार समझ लिया?
या फिर उस बंदरिया की, जो शायद अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यवहार कर रही थी?
आज भी इन प्रश्नों का उत्तर मेरे पास नहीं है।
लेकिन इतना अवश्य जान गया हूँ कि संसार में सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब किसी निर्दोष का आशियाना उजड़ता है।
और उससे भी बड़ी पीड़ा तब होती है, जब हम पूरी निष्ठा से किसी की रक्षा करना चाहें, फिर भी उसे बचा न सकें।
आज भी जब उस क्रिसमस ट्री को देखता हूँ, तो उसकी शाखाओं पर मुझे कोई घोंसला दिखाई नहीं देता…
लेकिन एक खालीपन अवश्य दिखाई देता है—
जो शायद हमेशा वहीं रहेगा।
कहते हैं समय हर घाव भर देता है।
पर कुछ घोंसले ऐसे होते हैं, जो पेड़ों पर नहीं, इंसान के हृदय में बनते हैं।
और जब वे उजड़ते हैं…
तो उनकी टीस जीवन भर साथ रहती है।
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