बारिश से अपना लैपटॉप बचाने की चिंता में खड़ा एक कॉरपोरेट कर्मचारी, कुछ गरीब बच्चों की मासूम खुशियां देखकर अपने बचपन में लौट जाता है। डॉ. शिखा अग्रवाल की यह लघुकथा जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का बड़ा संदेश देती है।
तेज़ बारिश से बचने के लिए रक्षित बस स्टैंड पर खड़ा था। उसे सबसे ज्यादा चिंता अपने लैपटॉप को भीगने से बचाने की थी। ‘ कल से तो बैग में एक पॉलीथिन बैग रख लूंगा। कम से कम बारिश से लैपटॉप तो नहीं भीगेगा ‘ उसने मन ही मन ही मन सोचा।
कॉरपोरेट के जॉब की भागमभाग में बारिश का आनंद लेना ही भूल गया था रक्षित। हर समय दिमाग ऑफिस के कामों में ही उलझा रहता था। इस समय उसे मम्मी के हाथ के गरम पकोड़े और भाप उठती चाय याद आ गई।
अचानक रक्षित का ध्यान वहीं भीख मांग रहे कुछ बच्चों पर गया। उन्होंने कचरे में पड़े कागजों को उठा कर हाथों में दबा कर गेंद की तरह कर लिया और सड़क किनारे बह रहे पानी में डाल दिया। उन्हें पानी में बहता देख कर वो सभी तालियां बजा कर खिलखिलाने लगे। उन बहती गेंदों ने उसे बचपन की काग़ज़ की नावों की याद दिला दी जो मम्मी उसे बना कर देती थीं। चलती नावों के देख कर वह भी तो ऐसे ही खुश होता था।
अगले दिन उसने काग़ज़ की ढेर सारी छोटी बड़ी नावें बना कर अपने लैपटॉप बैग में रख लीं, उन बच्चों के साथ बारिश में छोटी – छोटी खुशियां बांटने के लिए।
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