गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर पढ़िए डॉ.अनिता जैन ‘विपुला’ की हृदयस्पर्शी कविता, जिसमें गुरु को ज्ञान-गंगा, जीवन-सार और मुक्ति का द्वार बताया गया है।
गुरु ज्ञान-गंगा, गुरु गगन हैं, गुरु जीवन का सार;
तम के तट पर उगे दिवाकर, करें चेतना पार।
गहन अज्ञान-गिरि गलाते, भरते सत्य-प्रकाश;
करुणा-किरणों से महकाते, अन्तर्मन-आकाश।
चन्दन-सम संस्पर्श सुगन्धित, पारस-सम परिवर्तन;
दर्पण बन निज रूप दिखाते, मिटता मिथ्या-वर्तन।
कच्छप-दृष्टि कृपा बरसाती, चन्द्र-हृदय शीतल;
क्रौंच-स्मृति से शिष्य जगाते, प्रेम-प्रभा निर्मल।
दीक्षा देकर दिशा दिखाते, शिक्षा से संस्कार;
प्रेरक, सूचक, बोधक बनकर, खोलें मुक्ति-द्वार।
नाविक भी वे, नौका भी वे, वे ही पथ, पतवार;
भव-सागर के बीच खड़े हैं, बनकर दृढ़ आधार।
सागर गहरा, किन्तु गुरु की, गहराई अनन्त;
सागर तन को डुबो सके है, गुरु हर ले अहम्।
धर्म, विवेक, भक्ति, विरागी, सबका एक विधान;
गुरु-कृपा से जाग उठे जब, प्रकटे ब्रह्म-ज्ञान।
गुरु न केवल शब्द-उपदेशक, गुरु जीवन-अर्थ;
गुरु से ही जागे आत्मा का, अमर अनादि-पथ।
वन्दन उन चरणों को, जिनसे मिटे समस्त विकार;
गुरु ही ब्रह्म, गुरु ही सत्य, गुरु ही भव-पार।
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