डॉ. अलका अग्रवाल की कविता ‘इंद्रजाल’ में बदलते बादलों, आकाश, हवा और प्रकृति के मायावी रूप का बेहद सुंदर और भावपूर्ण चित्रण किया गया है। पढ़ें प्रकृति और कल्पना का अनूठा काव्य।
लो चलने लगीं नावें,
आसमान में
कजरारी, काली,
मटमैली, चमकदार
तेज चलती हवा में
पल-पल बदलतीं,
रूप, आकार
फिर से बदल गया रंग
बदल गया ढंग
जैसे फैलाया हो
किसी जादूगर ने इंद्रजाल।
देखते ही देखते,
दृष्टि के दायरे से
दूर, बहुत दूर
सभी नाव
न जाने निकल गईं कहां
शायद जादूगर चल दिया
समेट कर अपना मायाजाल।
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