पति की मृत्यु के बाद शोक में डूबी विभा को सांत्वना देने के बजाय एक कटाक्ष उसकी पीड़ा को और गहरा कर देता है। यह मार्मिक लघुकथा बताती है कि दुख की घड़ी में शब्द भी मरहम बन सकते हैं और घाव भी। अंत में कहानी पाठक से एक सवाल पूछती है—आखिर निर्मोही कौन है?
पति की मौत के दूसरे दिन सूनी आंखों से विभा पिछले अशुभ दिन के बारे में सोच रही थी। उसके चारों तरफ रिश्तेदार और पड़ोस की महिलाएं बैठी थीं। चार माह से पति की किडनी खराब होने के कारण वे अस्पताल में भर्ती थे।डाक्टर भी डायलिसिस और वेंटीलेटर सहित,अपनी सभी कोशिशें करके हार गए थे।
कल रात को ननद ने उसे नींद के लिए दवाई भी दे दी थी ,जिससे उसे तनिक राहत मिल सके ।
पड़ोस की रमा भाभी ने कुछ पूछा तो विभा वर्तमान में लौट आई।
‘रात को नींद आ गई थी, विभा?’
विभा ने मंतव्य न समझते हुए, बड़ी सरलता से कहा,
‘हां, सो गई थी।’
उसकी बात सुनते ही रमा भाभी ने पास बैठी औरत से विभा के सामने ही कुछ धीरे से, (लेकिन विभा सुन सके) व्यंग्य के स्वर में कहा,
‘कैसी निर्मोही होती हैं कुछ औरतें। हमारा तो कुत्ता मर गया था, तब भी हम कितने ही दिन तक नहीं सोए थे।’
विभा जो अब तक किसी तरह से संयम रखे हुई थी,यह सुनते ही उसके आंसू गालों तक पहुंच गए थे और वह बिलख – बिलख कर रोने लगी थी। विभा की ननद सोच रही थी,ऐसे दुखद
अवसर पर भी बाज नहीं आईं रमा भाभी। सोचने की बात है, निर्मोही कौन है ?
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