डा. अलका अग्रवाल की यह कविता समाज में न्याय और अन्याय के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाती है। जब निर्दोष को छोटी भूल पर कठोर दंड और प्रभावशाली व्यक्ति को बड़ी गलती पर भी छूट मिलती है, तब एक संवेदनशील मन अपने शब्दों के माध्यम से मौन प्रतिरोध दर्ज करता है।
जब भी मैं देखती हूं कि
किसी भोले-भाले व्यक्ति को उसकी बहुत छोटी भूल पर भी बहुत बड़ा दंड दिया गया।
और इसके ठीक विपरीत
किसी तेज- तर्रार को
पहाड़ जैसी भूल करने पर भी
दंड देना तो दूर
नजरअंदाज कर दिया गया।
तब तब मेरे अंदर की चेतना
मुझे परेशान करती है।
मैं इसका प्रतिकार करने को
कुछ कर गुजरने को
अधीर होने लगती हूं।
पर तभी यह होता है एहसास
कि व्यवस्था से लड़ने के लिए
मुकाबला करने के लिए
कितनी अशक्त
कितनी अपर्याप्त हूं।
मेरे मन को गहराई तक
व्याकुल कर जाता है
यह विवशता का अहसास।
जब कुछ कर नहीं पाती
यहां तक कि कुछ
कह भी नहीं पाती
तो अंतिम सहारा
कागज़ – कलम लेकर
बैठ जाती हूं।
कागज़ पर ही सही
शब्दों में ही सही
अपना विरोध
दर्ज़ तो करूं।
———————-
नई हवा खबरें अपने मोबाइल पर नियमित और डायरेक्ट प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप नंबर 9460426838 सेव करें और ‘Hi’ और अपना नाम, स्टेट और सिटी लिखकर मैसेज करें। आप अपनी खबर या रचना भी इस नंबर पर भेज सकते हैं।
