रथ 552 दिन चला… बिल 2,548 दिन का, बाकी 2,000 दिनों का पैसा कहां गया? NHM घोटाले में IAS समेत 5 पर 5,000 पन्नों की चार्जशीट

NHM घोटाले में एसीबी ने IAS समेत 5 आरोपियों के खिलाफ 5,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। आरोग्य रथ 552 दिन चला, लेकिन 2,548 दिन के बिल बनाकर 1 करोड़ से ज्यादा भुगतान का आरोप है।

जयपुर। ‘आरोग्य रथ’ का काम जितना जमीन पर हुआ, उससे कई गुना ज्यादा कागजों पर चलता रहा। एसीबी की जांच में सामने आई कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यही है—रथ वास्तव में 552 दिन चले, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में 2,548 दिन दौड़ते रहे।

इन अतिरिक्त करीब 2,000 दिनों के नाम पर बिल बनाए गए और 1 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान उठा लिया गया। अब इसी कथित खेल की परतें खोलते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने NHM घोटाले की FIR 115/2016 में आईएएस नीरज के. पवन समेत पांच आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालत में करीब 5,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। मामला सिर्फ फर्जी दिनों का नहीं है। एसीबी की जांच में टेंडर की रकम बढ़ाने से लेकर भुगतान के बदले कथित कमीशन और फर्जी दस्तावेज तैयार करने तक की कड़ियां सामने आई हैं।

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पहले 1.60 करोड़ का टेंडर… फिर सीधे 5 करोड़

वर्ष 2015-16 में चिकित्सा योजनाओं के प्रचार के लिए ‘आरोग्य रथ’ चलाने की योजना बनी। शुरुआती बजट 1.60 करोड़ रुपये था। एसीबी के मुताबिक, दलाल अजीत सोनी ने तत्कालीन NHM IEC ब्रांच के एमडी नीरज के. पवन और अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इस रकम को बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये करवा दिया। इसके बाद ‘सुरेंद्र इलेक्ट्रोटेक’ को टेंडर मिला।

फर्म ने अक्टूबर से दिसंबर 2015 तक महज तीन महीने काम किया। लेकिन यहीं से वह हिसाब सामने आया जिसने पूरे मामले को कटघरे में खड़ा कर दिया।

असली खेल यहीं था—552 दिन बनाम 2,548 दिन

जांच के मुताबिक रथों का वास्तविक संचालन 552 दिन हुआ था। मगर विभागीय रिकॉर्ड में यह आंकड़ा बढ़ाकर 2,548 दिन कर दिया गया। यानी करीब 2,000 ऐसे दिन, जिनका जमीन पर संचालन होने का सवाल ही खड़ा हो गया। आरोप है कि इन्हीं अतिरिक्त दिनों को आधार बनाकर फर्जी बिल तैयार किए गए और सरकारी खजाने से 1 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान निकाल लिया गया। यहीं से सवाल उठता है—जिन दिनों रथ चले ही नहीं, उन दिनों के बिल किस आधार पर बने और किसने पास किए?

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टेंडर से भुगतान तक 17% का कथित खेल

एसीबी की जांच में एक कथित कमीशन व्यवस्था का भी खुलासा हुआ है। ब्यूरो के अनुसार फर्मों से 17 प्रतिशत फिक्स कमीशन लिया जाता था। कथित फॉर्मूले में 5 प्रतिशत टेंडर जारी कराने के समय और 12 प्रतिशत भुगतान के वक्त लिया जाता था।

जांच में इसके कथित बंटवारे का भी उल्लेख है। नीरज के. पवन का हिस्सा 37 प्रतिशत, दीपा गुप्ता का 12 प्रतिशत, अनिल अग्रवाल का 2 प्रतिशत, जोजी वर्गीस का 0.45 प्रतिशत, सहायक लेखाधिकारी का 0.40 प्रतिशत, कैशियर का 0.25 प्रतिशत और अजीत सोनी का 0.35 प्रतिशत बताया गया है।

5,000 पन्नों में दर्ज हुआ पूरा नेटवर्क

चार्जशीट में एसीबी ने नीरज के. पवन, दीपा गुप्ता, जोजी वर्गीस, अजीत सोनी और सुनील राठौड़ को नामजद किया है।

सुनील राठौड़ पर फर्जी दस्तावेज और बिल तैयार करने में सहयोग का आरोप है। एसीबी के पास आरोपियों की बातचीत से जुड़े ऑडियो सबूत भी बताए गए हैं। आगे अदालत में इनकी FSL रिपोर्ट और वॉयस मैचिंग अहम भूमिका निभा सकती है।

एक आरोपी की भूमिका पर जांच अभी बाकी

टेंडर फर्म के संचालक सुरेंद्र सिंह की भूमिका को लेकर जांच अभी पूरी नहीं हुई है। उसके बैंक खातों में हुए लेन-देन और फर्जी बिलों से जुड़े पहलुओं की जांच धारा 173(8)/BNSS के तहत पूरक अनुसंधान में की जाएगी। इसके बाद उसके खिलाफ पूरक चार्जशीट पेश की जा सकती है।

मामले में तत्कालीन अतिरिक्त निदेशक अनिल अग्रवाल की भूमिका को लेकर भी जांच जारी है।

2016 की FIR से 2026 की चार्जशीट तक

यह मामला वर्ष 2016 में दर्ज हुआ था। नीरज के. पवन के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति 2021 में मिल गई थी। करीब एक दशक पुराने इस मामले में अब 5,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल होने के बाद मुकदमे की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

अब अदालत के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं होगा कि सरकारी पैसा कैसे निकला। असली सवाल यह होगा कि 552 दिन के काम को 2,548 दिन का हिसाब किस तंत्र ने बनाया, उन कागजी दिनों पर बिल किसने तैयार किए और भुगतान की मंजूरी किस स्तर पर मिली। यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब इस पुराने NHM घोटाले की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।

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