नई रिसर्च में दावा किया गया है कि हाई ब्लड प्रेशर का असर सिर्फ दिल ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। जानिए डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर और पर्सनैलिटी के बीच क्या संबंध मिला।
नई हवा, हेल्थ डेस्क। अगर आप अब तक यह सोचते थे कि हाई ब्लड प्रेशर सिर्फ दिल, किडनी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता है, तो यह नई रिसर्च आपको चौंका सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर इंसान की सोच, भावनाओं और यहां तक कि उसके व्यक्तित्व (पर्सनैलिटी) से भी जुड़ा हो सकता है। यानी मामला सिर्फ धड़कनों का नहीं, आपके स्वभाव का भी हो सकता है।
इसी वजह से डॉक्टर वर्षों से हाई ब्लड प्रेशर को ‘साइलेंट किलर’ कहते आए हैं। यह अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाता रहता है। अब एक नए अध्ययन ने इसके असर का दायरा और बड़ा कर दिया है।
नई रिसर्च में क्या निकला?
हाल ही में ‘जनरल साइकियाट्री’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर की डायस्टोलिक रीडिंग यानी ब्लड प्रेशर की निचली संख्या का संबंध इंसान के व्यक्तित्व के एक खास गुण ‘न्यूरोटिसिज्म’ से पाया गया है।
आसान शब्दों में कहें तो जिन लोगों का डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर अधिक था, उनमें तनाव, चिंता, नकारात्मक सोच और भावनात्मक अस्थिरता जैसी प्रवृत्तियां अपेक्षाकृत ज्यादा देखी गईं।
पहले समझिए, सिस्टोलिक और डायस्टोलिक क्या होते हैं?
ब्लड प्रेशर हमेशा दो अंकों में लिखा जाता है।
- सिस्टोलिक (ऊपरी संख्या): जब दिल शरीर में खून पंप करता है, उस समय धमनियों पर पड़ने वाला दबाव।
- डायस्टोलिक (निचली संख्या): जब दिल दो धड़कनों के बीच आराम की स्थिति में होता है, उस समय रक्त वाहिकाओं में मौजूद दबाव।
इस अध्ययन में सबसे मजबूत संबंध डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर के साथ देखने को मिला।
क्या है ‘न्यूरोटिसिज्म’, जिससे जुड़ा मिला हाई BP?
न्यूरोटिसिज्म व्यक्तित्व का ऐसा गुण है, जिसमें व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर जरूरत से ज्यादा तनाव लेने लगता है। ऐसे लोग जल्दी चिंता करते हैं, खुद पर संदेह करते हैं, आलोचना से अधिक प्रभावित होते हैं और नकारात्मक भावनाओं से आसानी से घिर जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे लोगों में आगे चलकर चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा भी अधिक हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह पता?
इस संबंध की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने मेंडेलियन रैंडमाइजेशन नामक आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इसमें जीन के आधार पर यह समझने की कोशिश की जाती है कि दो चीजों के बीच सिर्फ संबंध है या वास्तव में कारण और परिणाम का रिश्ता भी हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने ब्लड प्रेशर से जुड़े 1,000 से अधिक आनुवंशिक संकेतकों का विश्लेषण किया और यूरोपीय मूल के लोगों पर आधारित आठ बड़े अध्ययनों के आंकड़ों का मूल्यांकन किया।
क्या हाई BP से डिप्रेशन भी होता है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अध्ययन में यह स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला कि हाई ब्लड प्रेशर सीधे तौर पर चिंता या अवसाद का कारण बनता है। सबसे मजबूत संबंध केवल न्यूरोटिसिज्म नामक व्यक्तित्व गुण के साथ पाया गया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर मस्तिष्क की बेहद महीन रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकता है। इससे दिमाग के वे हिस्से प्रभावित हो सकते हैं, जो भावनाओं और तनाव को नियंत्रित करते हैं।
दूसरी संभावना यह भी है कि जो लोग पहले से अधिक तनावग्रस्त रहते हैं, उनमें समय के साथ ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। यानी दोनों स्थितियां एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं।
क्या अभी चिंता करने की जरूरत है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस अध्ययन को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। अलग-अलग देशों और विभिन्न समुदायों के लोगों पर अभी और शोध की जरूरत है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर पूरी तरह नियंत्रित हो जाए, तो क्या उसके व्यक्तित्व में भी कोई बदलाव आएगा।
फिर भी यह अध्ययन दिल और दिमाग के बीच मौजूद गहरे रिश्ते को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है।
दिल भी सुरक्षित, दिमाग भी स्वस्थ… इसके लिए क्या करें?
डॉक्टरों की सलाह साफ है—
- ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराएं।
- संतुलित और कम नमक वाला भोजन लें।
- रोजाना व्यायाम या तेज चाल से पैदल चलें।
- पर्याप्त नींद लें।
- धूम्रपान और शराब से दूरी रखें।
- तनाव कम करने के उपाय अपनाएं।
- डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं समय पर लेते रहें।
हाई ब्लड प्रेशर को हल्के में लेना सिर्फ दिल के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
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