‘इतनी कमाई चाहिए…’ क्या अब डॉक्टरों को भी दिए जा रहे हैं सेल्स टारगेट?

डीएमए इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी और डॉ. प्रांजल निबुधे ने कॉर्पोरेट अस्पतालों में डॉक्टरों पर Revenue Target थोपने के आरोपों की NHRC से जांच कराने की मांग की।

नई दिल्ली। क्या अस्पतालों में डॉक्टरों के सामने इलाज से पहले कमाई का लक्ष्य रखा जाता है? क्या मरीज के इलाज का फैसला सिर्फ उसकी बीमारी देखकर होता है या फिर अस्पताल के राजस्व लक्ष्य भी उस पर असर डालते हैं? कॉर्पोरेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसे सवाल एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं।

डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए इंडिया) ने दावा किया है कि कई कॉर्पोरेट अस्पतालों में डॉक्टरों पर Revenue Generation Target का दबाव बनाया जा रहा है। संगठन का कहना है कि यदि इलाज के फैसलों पर व्यावसायिक लक्ष्य हावी होते हैं तो इससे न केवल डॉक्टरों की पेशेवर स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि मरीजों के निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित उपचार का अधिकार भी सवालों के घेरे में आ जाता है।

इसी मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए डीएमए इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी और महाराष्ट्र के कोर सदस्य डॉ. प्रांजल निबुधे ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को विस्तृत प्रतिनिधित्व भेजा है। संगठन ने डॉ. प्रांजल निबुधे द्वारा पहले से दर्ज कराई गई शिकायत का समर्थन करते हुए इसे पूरे देश के मरीजों और डॉक्टरों से जुड़ा मुद्दा बताया है।

डीएमए इंडिया का कहना है कि डॉक्टरों के चिकित्सकीय निर्णय केवल मरीज के सर्वोत्तम हित में होने चाहिए, न कि किसी वित्तीय लक्ष्य के दबाव में। संगठन ने आयोग से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप कर ऐसी व्यवस्थाओं की समीक्षा कराने और डॉक्टरों की पेशेवर स्वतंत्रता व मरीजों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की अपील की है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास ने चिकित्सा सेवा को मानवता की सेवा बताते हुए कहा कि डॉक्टरों का मूल्यांकन राजस्व से नहीं, बल्कि मरीजों को मिले नैतिक और गुणवत्तापूर्ण इलाज से होना चाहिए। डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी ने Revenue Target को डॉक्टरों की Professional Autonomy पर सीधा आघात बताया, जबकि डॉ. प्रांजल निबुधे ने कहा कि यह केवल डॉक्टरों का नहीं, बल्कि हर मरीज के भरोसे और पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता का सवाल है।

संगठन के अनुसार, यदि किसी डॉक्टर के प्रदर्शन को मरीजों के सफल उपचार के बजाय अस्पताल की आय से जोड़ा जाता है तो इससे चिकित्सा व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि डीएमए इंडिया ने इस मुद्दे को केवल डॉक्टरों का नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मरीजों के अधिकारों और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बताया है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अमित व्यास ने कहा कि चिकित्सा सेवा का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा करना है। उनके अनुसार डॉक्टरों का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने मरीज को कितना सुरक्षित, नैतिक और वैज्ञानिक उपचार दिया, न कि उन्होंने अस्पताल के लिए कितना राजस्व अर्जित किया।

राष्ट्रीय महासचिव डॉ. शुभ प्रताप सोलंकी ने कहा कि डॉक्टरों पर Revenue Target थोपना उनकी Professional Autonomy पर सीधा आघात है। इससे डॉक्टर स्वतंत्र चिकित्सकीय निर्णय लेने के बजाय व्यावसायिक दबाव महसूस कर सकते हैं, जिसका असर स्वास्थ्य सेवाओं में जनता के विश्वास पर भी पड़ सकता है।

वहीं, महाराष्ट्र से डीएमए के कोर सदस्य डॉ. प्रांजल निबुधे ने कहा कि यह मुद्दा किसी एक अस्पताल, एक राज्य या केवल डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। यह हर उस मरीज से जुड़ा सवाल है, जो अस्पताल में यह भरोसा लेकर पहुंचता है कि उसके इलाज का फैसला केवल उसकी चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर होगा।

डीएमए इंडिया ने अपने प्रतिनिधित्व में आयोग से आग्रह किया है कि कॉर्पोरेट अस्पतालों में डॉक्टरों पर कथित तौर पर लगाए जा रहे Revenue Targets की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए। साथ ही केंद्र एवं राज्य सरकारों तथा संबंधित स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं से रिपोर्ट लेकर यह सुनिश्चित किया जाए कि कहीं व्यावसायिक नीतियां चिकित्सा नैतिकता और मरीजों के अधिकारों पर तो हावी नहीं हो रहीं।

संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस विषय में किसी प्रकार की जांच या अन्य कार्रवाई शुरू करता है तो डीएमए इंडिया हर स्तर पर पूरा सहयोग देगा। साथ ही दोहराया कि ‘चिकित्सा सेवा कोई व्यापार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। डॉक्टरों का मूल्यांकन उनकी कमाई से नहीं, बल्कि मरीजों को मिले गुणवत्तापूर्ण, नैतिक और साक्ष्य-आधारित उपचार से होना चाहिए।’

कॉर्पोरेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर उठे इन सवालों पर अब सभी की नजर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अगली पहल पर रहेगी। यदि इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठता है तो इसका असर न केवल डॉक्टरों की कार्यप्रणाली, बल्कि देश की निजी स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन और मरीजों के अधिकारों पर भी पड़ सकता है।

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