वो पिता ही है जो…

वो पिता ही है
जो सब कुछ सह जाता है।
तपती धूप में

 कब तक सिसकेगी मानवता…

मेहनतकश को है सज़ा यहां,
नाकारा इज्जत पाते हैं,
खुद का हक है सबको प्यारा

 कब तक सिसकेगी मानवता…

मेहनतकश को है सज़ा यहां,
नाकारा इज्जत पाते हैं,
खुद का हक है सबको प्यारा

पुकार…

हे आशुतोष मुझे अपना लो
अपने जैसा मुझे बना लो

आज की लक्ष्मीबाई…

प्रातः काल जो धधक उठी थी,
क्रोध भरी चिंगारी थी।
मत पूछो वो कौन थी यारो

अपनी कब चली, पता ही नहीं चला…

कैसे कटा
21 से 60 तक का
यह सफ़र,
पता ही नहीं चला।

दौसा के अंजीव अंजुम को हिंदी संस्थान लखनऊ का कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान

दौसा के वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. अंजीव अंजुम को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा संचालित बाल साहित्य संवर्धन योजना के अंतर्गत राज्य के अन्य आठ बाल

ज़िन्दगी कुछ तो दे मशवरा…

ऐ ज़िन्दगी क्यूं कर रही है परेशान,
राह ए हयात कुछ तो कर आसान

लिख ही गई दर्द से उपजी एक और रचना…

उन आँखों में बसा
घनघोर अँधेरा
छिपा हुआ था
मुस्कुराहट के

जनम जनम की प्रीत निभाएं

आया श्रावणी तीज का त्यौहार
मन में छाया हर्षोल्लास अपार