शब्द सो गए मौन ओढ़कर…

आवाज बांधकर
जंजीरों से
शब्द सो गए

पावस ॠतु

पावस ऋतु का पावन माह
मनभावन यह सावन माह
रिमझिम रिमझिम बरसाए मेह
चंहु ओर बिखराए नेह

पावस ॠतु

पावस ऋतु का पावन माह
मनभावन यह सावन माह
रिमझिम रिमझिम बरसाए मेह
चंहु ओर बिखराए नेह

काश! इन जख्मों को कोई चीख मिल पाती

पलकों की कोर से ढलकते
उस से पहले
रोक दिया उसने

धूप का इक नन्हा कतरा…

धूप का इक नन्हा कतरा
रोज सुबह
मेरे घर के अहाते में

मुझे अमन चाहिए…

मेरे शहर को ये क्या हो गया,
अमन ओ चैन का गुलिस्तां

समीक्षा: मन दर्पण

मन दर्पण में मन के विचारों की अनुभूति को प्रतिच्छादित करने का प्रयास स्तुत्य है। मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में निरुपित किया गया है। आत्मकथ्यात्मक शैली में

दर्शन…

भोर की प्रथम किरण,
धरा पर उतर रही।

पुस्तक समीक्षा: वाणी के जादूगर उद्घोषकों के लिए अद्भुत पुस्तक ‘वाक्‌ कला’

कीर्ति, काव्य और ऐश्वर्य की श्रेष्ठता उसके सर्वहिताय एवं मांगलिक प्रयोजन में निहित है। रचनाकार का दृष्टिकोण सर्वभूतहिते होने पर ही उसकी सार्थकता होती है। हिन्दी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान

मो को दूर तनिक मत कीजो…

मैं अबोध, निर्मल बुद्धि-मन,
कली कोपल सो, यो मोरो तन