डॉ. अलका अग्रवाल की कविता ‘आज की सीता’ आधुनिक नारी की पीड़ा, सामाजिक लांछन, अग्नि परीक्षा और सम्मान के लिए उसके संघर्ष को मार्मिक शब्दों में सामने रखती है।
क्या अग्नि परीक्षा
सिर्फ सीता ने ही दी थी?
आज तक न जाने
कितनी सीता दे चुकी हैं,
दे रही हैं
समय-समय पर
इसी तरह अग्नि परीक्षा।
….और पूरी तरह पवित्र
प्रमाणित होने पर भी
समाज करता रहा है
अपने वाक् बाणों से
उन्हें लांछित, प्रताड़ित,
कलंकित, अपमानित।
अग्नि- परीक्षा के बाद भी
निकाल दिया गया है उन्हें
निरपराध होने पर भी
अपने-अपने घर से।
लेकिन आज की सीता को
दर-दर भटकने के बाद भी
किसी बाल्मीकि के आश्रम में
शरण नहीं मिलती।
तिल- तिल कर
जलने के बाद भी
हर दिन मरने के बाद भी
धरती की गोद नहीं मिलती
वह तड़प तड़प कर बस
विवश हो जीती रहती है।
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