स्कूल में सियासत पर ABRSM का वार—‘शिक्षा के मंदिर को अखाड़ा नहीं बनने देंगे’ | महासंघ ने बाहरी दखल पर उठाए सवाल

राजकीय विद्यालय में विवाद के बाद ABRSM ने राजनीतिक और बाहरी हस्तक्षेप पर सख्त रुख अपनाया। उमराव लाल वर्मा, बसंत जिंदल, अर्जुन सिंह और देवेन्द्र शर्मा ने स्कूलों को राजनीति से दूर रखने की मांग की।

जयपुर। राजकीय स्कूल में हुए विवाद के बाद अब मामला सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहा। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) ने सरकारी स्कूलों में राजनीतिक गतिविधियों और बाहरी हस्तक्षेप को लेकर खुलकर मोर्चा खोल दिया है। महासंघ ने साफ कहा है कि विद्यालय विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण की जगह हैं, राजनीतिक टकराव और शक्ति प्रदर्शन की नहीं।

प्रदेश संगठन मंत्री उमराव लाल वर्मा ने कल की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि प्राप्त जानकारी के अनुसार सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका के साथ कुछ बाहरी लोगों के राजकीय विद्यालय में निरीक्षण के प्रयास का ग्रामीणों ने विरोध किया। इसके बाद विवाद बढ़ा और कथित तौर पर गाली-गलौज तथा मारपीट की स्थिति बनी।

वर्मा ने कहा कि किसी भी तरह की हिंसा या मारपीट का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी खड़ा होता है कि राजकीय विद्यालयों से जुड़े विवादों को राजनीतिक टकराव का रूप देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है।

उनका कहना था कि किसी स्कूल की व्यवस्था, सुविधाओं या पढ़ाई को लेकर शिकायत है तो शिक्षा विभाग और प्रशासन के सामने निर्धारित माध्यम मौजूद हैं। बिना तय प्रक्रिया के विद्यालय परिसर में पहुंचकर विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।

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‘विद्यालय में शिक्षा होगी, राजनीति नहीं’

महासंघ के अतिरिक्त महामंत्री बसंत जिंदल ने कहा कि राजस्थान में विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की प्रक्रिया लगातार चल रही है। संसाधनों से लेकर शिक्षण, अनुशासन और प्रशासनिक व्यवस्था तक अलग-अलग स्तर पर सुधार किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि राजनीति करना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन सरकारी स्कूलों को राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जिंदल ने शिक्षकों को राजनीतिक दबाव में लाने के प्रयासों को भी गंभीर चिंता का विषय बताया। उनके मुताबिक शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण के लिए हैं, किसी राजनीतिक दल के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नहीं।

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सरकार के आदेशों के समर्थन में महासंघ

संभाग उपाध्यक्ष अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की ओर से शिक्षा व्यवस्था में किए जा रहे सुधारों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि विद्यालयों में बाहरी और राजनीतिक हस्तक्षेप को नियंत्रित करने के लिए जारी दिशा-निर्देशों का मकसद स्कूलों में सुरक्षित, अनुशासित और बेहतर शैक्षणिक माहौल तैयार करना है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन दिशा-निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को स्कूल में आने से रोक दिया गया है। निर्धारित प्रक्रिया के तहत संस्था प्रधान की अनुमति लेकर विद्यालय में प्रवेश किया जा सकता है।

ऐसे में प्रक्रिया का पालन करने के बजाय सरकारी आदेशों को ही राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं है।

‘राजनीतिक फायदे के लिए बच्चों का भविष्य दांव पर न लगे’

प्रदेश संगठन मंत्री देवेन्द्र शर्मा ने कहा कि राजनीतिक दल और संगठन अपनी गतिविधियों के लिए लोकतांत्रिक मंचों का इस्तेमाल करें। सरकारी स्कूलों में जाकर राजनीतिक टकराव पैदा करना विद्यार्थियों, शिक्षकों और पूरी शिक्षा व्यवस्था—किसी के हित में नहीं है।

हालांकि महासंघ ने यह भी कहा कि यदि किसी विद्यालय में वास्तविक समस्या है तो उसका समाधान कराने के लिए प्रशासन के सामने तथ्यात्मक और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति विद्यालय को राजनीतिक प्रचार, निरीक्षण या शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाने पर है।

हिंसा भी नहीं, राजनीतिक दखल भी नहीं

महासंघ ने ग्रामीणों, शिक्षकों, अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक-सामाजिक संगठनों से अपील की कि विद्यालयों से जुड़े मामलों में टकराव की स्थिति पैदा न करें। विवाद होने पर कानून और प्रशासन की निर्धारित प्रक्रिया का सहारा लिया जाए।

ABRSM ने एक तरफ घटना में हुई हिंसा का विरोध किया है, तो दूसरी तरफ स्कूलों में राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ भी अपना रुख साफ कर दिया है। महासंघ ने संकेत दिया कि भविष्य में नियमों की अनदेखी कर किसी राजकीय विद्यालय में राजनीतिक गतिविधि या बाहरी हस्तक्षेप का प्रयास हुआ तो संबंधित अधिकारियों के सामने मामला उठाने के साथ वैधानिक और लोकतांत्रिक स्तर पर कार्रवाई की जाएगी।

10 हजार स्कूलों में काम का दावा

महासंघ ने अपने संगठनात्मक कामकाज का उल्लेख करते हुए कहा कि ABRSM विद्यालय शिक्षा भारत के सभी स्कूलों को तीर्थ के रूप में विकसित करने के लिए जनता, एसडीएमसी सदस्यों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षकों को लगातार प्रेरित कर रहा है।

संगठन के अनुसार राजस्थान के करीब 10 हजार स्कूलों में ABRSM से जुड़े शिक्षक कार्यकर्ता इस दिशा में काम कर रहे हैं। महासंघ का दावा है कि इन विद्यालयों में भौतिक संसाधन जुटाने के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए भी अनुकरणीय कार्य किए गए हैं।

महासंघ का संदेश साफ है—स्कूल बच्चों के भविष्य की प्रयोगशाला हैं, राजनीति का अखाड़ा नहीं। शिक्षकों को राजनीतिक दबाव या किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाने की कोशिश का वह विरोध करेगा और विद्यालयों की गरिमा से समझौता नहीं करेगा।

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