IIIT-Delhi के भारतीय शोधकर्ताओं ने दुनिया में अपनी तरह का पहला MutAIverse GenAI प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो DNA क्षति से कैंसर के संभावित रासायनिक कारणों के सुराग तलाशता है।
नई दिल्ली। भारत के शोधकर्ताओं ने कैंसर की वजहों को समझने की दिशा में एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो दुनिया में अपनी तरह की पहली बताई जा रही है। दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT-Delhi) के वैज्ञानिकों ने ‘MutAIverse’ नाम का जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म तैयार किया है। यह कैंसर मरीज के DNA में हुई क्षति का विश्लेषण कर उस पर्यावरणीय रसायन या जहरीले पदार्थ के संभावित स्रोत तक पहुंचने की कोशिश करता है, जिसने DNA में यह बदलाव पैदा किया हो सकता है।
इस शोध में गुवाहाटी के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPER) और CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (CSIR-IGIB) के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। यानी यह उपलब्धि केवल एक संस्थान की नहीं, बल्कि देश के कई प्रमुख शोध संस्थानों के सहयोग का परिणाम है।
कैंसर की पहचान नहीं, उसके पीछे का कारण खोजने की कोशिश
अब तक कैंसर की जांच में मुख्य सवाल यह रहता है कि बीमारी है या नहीं, कितनी बढ़ चुकी है और उसका इलाज कैसे किया जाए। भारतीय शोधकर्ताओं ने इससे आगे जाकर एक अलग सवाल पर काम किया है—आखिर कैंसर शुरू होने के पीछे मरीज किस संभावित रासायनिक जोखिम के संपर्क में आया था?
MutAIverse इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करता है। यह DNA में मौजूद क्षति के संकेतों को पढ़कर संभावित बाहरी रासायनिक संपर्क तक पीछे जाने का प्रयास करता है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और IIIT-Delhi के कंप्यूटेशनल बायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर गौरव आहूजा के अनुसार, हमारे आसपास का वातावरण लगातार कई तरह के रसायनों के संपर्क में लाता है। ये रसायन DNA में बदलाव पैदा कर सकते हैं और संभावित रूप से कैंसर के विकास में भूमिका निभा सकते हैं।
27 मरीजों पर किया गया परीक्षण, सामने आया तंबाकू का जोखिम
भारतीय वैज्ञानिकों ने MutAIverse का परीक्षण असम के गुवाहाटी में सिर और गर्दन के कैंसर से पीड़ित 27 मरीजों के नमूनों पर किया।
इन मरीजों के ट्यूमर बायोप्सी नमूनों के विश्लेषण में धुआंरहित तंबाकू के सेवन से जुड़े संभावित DNA बदलावों की पहचान हुई। नमूने डॉ. भुवनेश्वर बरुआ कैंसर इंस्टीट्यूट, गुवाहाटी के सहयोग से जुटाए गए, जबकि DNA adductomics का अध्ययन NIPER में किया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने धुआंरहित तंबाकू को इन मरीजों में संभावित जोखिम कारक के तौर पर पहचाना है। इसका यह अर्थ नहीं है कि मौजूदा तकनीक निर्णायक रूप से साबित कर देती है कि उसी रासायनिक क्षति ने कैंसर पैदा किया।
400 से बढ़ाकर 3 लाख से ज्यादा कर दी DNA adducts की लाइब्रेरी
इस भारतीय तकनीक की एक बड़ी उपलब्धि DNA adducts की संदर्भ लाइब्रेरी का विस्तार भी है।
DNA adducts ऐसी रासायनिक संरचनाएं हैं, जो कुछ विषैले रसायनों के DNA से जुड़ने पर बन सकती हैं और DNA में बदलाव पैदा कर सकती हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक GenAI की मदद से उपलब्ध संदर्भ adducts की संख्या 400 से कम से बढ़कर तीन लाख से ज्यादा हो गई।
यही विशाल संदर्भ आधार MutAIverse को DNA में मिले नुकसान की संभावित वजह तलाशने में मदद करता है। इस AI प्रणाली का विवरण Journal of Cheminformatics में प्रकाशित शोधपत्र में दिया गया है।
‘AdductLinker’ DNA की चोट से पीछे जाकर ढूंढता है रसायन
MutAIverse के भीतर ‘AdductLinker’ नाम का मशीन लर्निंग आधारित बैकट्रैकिंग टूल काम करता है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए—ट्यूमर के DNA में अगर कोई क्षति मिलती है तो यह टूल उस क्षति से पीछे की ओर जाने की कोशिश करता है और पता लगाता है कि कौन-सा पर्यावरणीय रसायन, विषैला पदार्थ या संभावित कार्सिनोजेन इस बदलाव से जुड़ा हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना एक ऐसे जासूस से की है, जो मौके पर मिले सुरागों से पीछे जाते हुए संभावित स्रोत तक पहुंचता है।
AI को मिलेगा मरीज के ट्यूमर का Mass Spectrometry डेटा
MutAIverse में मरीज के ट्यूमर बायोप्सी से प्राप्त mass spectrometry डेटा को इनपुट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
DNA के चार प्रमुख न्यूक्लियोटाइड बेस—A, T, G और C—में किसी रसायन के कारण बदलाव हो सकता है। AI इन बदलावों और DNA adducts की जानकारी का विश्लेषण कर संभावित रासायनिक संपर्क तक पहुंचने का प्रयास करता है।
इसका आउटपुट संभावित रसायन या विषैले पदार्थ के साथ confidence score, क्षतिग्रस्त DNA की संरचना और शरीर में उस रसायन के टूटने से बनने वाले संभावित मध्यवर्ती रसायनों की जानकारी भी दे सकता है।
भारतीय शोध का फायदा सिर्फ मरीज तक सीमित नहीं
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस तकनीक की उपयोगिता केवल एक मरीज के कैंसर को समझने तक सीमित नहीं हो सकती।
अगर किसी मरीज में तंबाकू उत्पाद या किसी व्यावसायिक रसायन से जुड़े संभावित जोखिम की पहचान होती है, तो वह भविष्य में उस संपर्क से बच सकता है। वहीं यदि वही जोखिम किसी खास इलाके या कार्यस्थल में मौजूद है तो वहां रहने या काम करने वाले दूसरे लोगों को भी सावधान किया जा सकता है।
यानी भविष्य में ऐसी तकनीक कैंसर के इलाज के साथ-साथ उसके जोखिम को रोकने की दिशा में भी उपयोगी हो सकती है।
लेकिन वैज्ञानिकों ने खुद बताई तकनीक की सीमा
इस उपलब्धि के बावजूद शोधकर्ताओं और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने इसे अभी अंतिम समाधान नहीं माना है।
IIT कानपुर के जैविक विज्ञान और बायोइंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सरवनन मथेश्वरन ने स्पष्ट किया कि DNA adduct का मिलना यह बताता है कि किसी रसायन ने DNA के साथ संपर्क किया था, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसी क्षति ने ऐसा म्यूटेशन पैदा किया, जिससे अंततः कैंसर हुआ।
कुछ DNA क्षतियों को कोशिकाएं ठीक कर सकती हैं, जबकि कुछ बनी रह सकती हैं और जीनोमिक अस्थिरता में योगदान दे सकती हैं। इसलिए DNA adduct और कैंसर के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित करने के लिए अभी और प्रयोगात्मक, क्लिनिकल तथा महामारी विज्ञान संबंधी प्रमाण चाहिए।
अभी अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली जांच नहीं
अशोका विश्वविद्यालय के कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट और जीवविज्ञान के प्रोफेसर केदार नटराजन ने कहा कि भारत में सिर और गर्दन के कैंसर, खासकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में, धुआंरहित तंबाकू और सुपारी का सेवन महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल है।
हालांकि उन्होंने भी साफ किया कि वर्तमान स्वरूप में MutAIverse एक प्रभावशाली कंप्यूटेशनल रिसर्च टूल है, इसे अभी अस्पतालों या समुदायों में इस्तेमाल होने वाला क्लिनिकल डायग्नोस्टिक टूल नहीं माना जा सकता।
आगे जीनोम सीक्वेंसिंग के साथ मिलकर बदल सकता है कैंसर रिसर्च का तरीका
भारतीय शोधकर्ताओं की यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसके आगे बढ़ने की संभावनाएं बड़ी हैं। पर्याप्त सत्यापन के बाद MutAIverse को जीनोम सीक्वेंसिंग और अन्य तकनीकों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे भविष्य में वैज्ञानिकों को कैंसर के मरीज में केवल बीमारी की मौजूदगी या DNA में हुए बदलावों को देखने के बजाय यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस संभावित बाहरी जोखिम ने बीमारी के विकास में भूमिका निभाई।
यही MutAIverse की सबसे बड़ी खासियत है—भारत में विकसित यह GenAI प्लेटफॉर्म कैंसर के इलाज से पहले उसके पीछे छिपे संभावित कारणों के सुराग तलाशने की दिशा में एक नया रास्ता खोल रहा है।
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