भारतीय वैज्ञानिकों (IIG) ने आयनमंडल के अध्ययन के लिए नई तकनीक खोजी। इससे भारत के नेविगेशन सिस्टम नाविक (NavIC), GPS और संचार सेवाएं और मजबूत होंगी।
नई दिल्ली। भारतीय वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और बड़ी और ऐतिहासिक सफलता हाथ लगी है। देश के ऊपर मौजूद ‘ऊपरी आयनमंडल’ (Upper Ionosphere) को अधिक सटीकता से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पहली बार एक बेहद अनूठी तकनीक विकसित की है।
यह नई तकनीक जमीन और अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा को मिलाकर काम करती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस खोज के बाद देश में मोबाइल संचार (Communication System), सैटेलाइट संचालन और नेविगेशन सेवाएं पहले से कई गुना अधिक मजबूत और भरोसेमंद हो जाएंगी।
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क्यों खास है यह खोज? समझिए नेविगेशन और ‘नाविक’ (NavIC) का कनेक्शन
आयनमंडल पृथ्वी के वायुमंडल का वह हिस्सा है जहाँ मौजूद इलेक्ट्रॉनों की संख्या में होने वाले बदलाव सीधे तौर पर हमारी रेडियो तरंगों को प्रभावित करते हैं।
सिग्नल की रुकावट होगी दूर: जब GPS या भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम ‘नाविक’ (NavIC) के सिग्नल आयनमंडल से गुजरते हैं, तो उनके डेटा में बदलाव या देरी होने का खतरा रहता है।
खत्म होंगे पुराने अनुमान: पहले सटीक जानकारी न होने के कारण वैज्ञानिकों को केवल अनुमानों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे वास्तविक स्थिति समझना मुश्किल था। लेकिन अब इस नई तकनीक से ऊंचाई के साथ इलेक्ट्रॉन में होने वाले बदलावों का एकदम सटीक पता लगाया जा सकेगा, जो खासकर भूमध्य रेखा (Equator) के पास स्थित भारत जैसे देश के लिए बेहद जरूरी है।
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इस चुनौतीपूर्ण रास्ते को आसान बनाने का कारनामा भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाले भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान (IIG) के वैज्ञानिकों ने किया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह नया फॉर्मूला भारतीय क्षेत्र में अंतरिक्ष के मौसम (Space Weather) की सटीक भविष्यवाणी करने में मदद करेगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि भविष्य में आने वाले किसी भी अंतरिक्ष तूफान या गड़बड़ी से हमारे सैटेलाइट्स और नेविगेशन सिस्टम को सुरक्षित रखा जा सकेगा। यह अध्ययन भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान की तकनीकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर एक नई ऊंचाई देने वाला कदम माना जा रहा है।
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