कविता
सारिका उनियाल
हर जगह चीखे हैं
हर जगह तबाही है,
मौत ने मचायी,
हर जगह तबाही है।
कहीं सूनी हो गई गोद,
कहीं ममता सूनी हो गई,
कहीं राखी बिखर गई है,
कहीं कलाई सूनी हो गई।
कहीं बिलखते बच्चे,
कहीं माता-पिता की चीखें,
कहीं सूनी हो गई मांग,
कहीं सन्नाटा पसर गया।
कोई अपनों को खो रहा है,
कोई साथी से बिछड़ गया है,
भीड़ से भरे अस्पतालों में,
सांसें दम तोड़ रही हैं।
कहीं लाइनों में लोग लगे हैं,
जिन्दगी की चंद सांसें गिन रहे हैं,
धधक रहे हैं श्मशान,
जगह-जगह चिता जल रही हैं।
कोई जिन्दगी बेच रहा है,
किसी की आत्मा मर गई है,
जिन्दगी बचाने वाले हाथ,
बेबस हो गए हैं।
कहीं दरियादिल इंसान भी हैं,
जो जीवन दान दे रहे हैं,
कुछ ऐसे भी लोग हैं,
जो कागजों पर दान दे रहे हैं।
सांसें महंगी हो गई हैं,
मौत सस्ती हो गई है,
देख ऊपर वाले,
तेरी दुनिया तबाह हो रही है।
21/ 437 त्रिलोकपुरी, दिल्ली-91 (लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और एक एनजीओ में काम करती हैं )
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