सुख…

जीवन 

 डॉ. अलका अग्रवाल, सेवानिवृत कॉलेज प्राचार्य, जयपुर  


पानी के बुलबुले की भांति क्षणिक,
कांच की भांति भंगुर,
स्वयं की परछाई की भांति 
हाथ ना आने वाला
होता है सुख।

जीवन भर सुख के पीछे
भागते रहने पर भी
सुख हाथ में आते ही 
पारे की तरह
फिसल जाता है।

सुख के पीछे दौड़ने वाला
हाथ मलता रह जाता है।
हाँफता है, थकता है।
मरीचिका के पीछे
भागता ही रह जाता है।
यूं ही ,जीवन बीत  जाता है।

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