दादा जी, आरव और अमायरा की प्रेरक लघुकथा ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ बताती है कि शिकायत करने के बजाय स्वयं पहल करने से कैसे एक उजड़ा पार्क हरा-भरा बगीचा बन सकता है। पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सामूहिक प्रयास का सुंदर संदेश।
लघुकथा
डॉ. शिखा अग्रवाल
‘दादा जी, पार्क में सफाई नहीं है, पेड़ पौधे भी बेतरतीब बढ़ रहे हैं। हम वहाँ नहीं जाएंगे’ छुट्टी में दादा दादी के घर आये हुए आरव और अमायरा की बात सुन कर दादा जी सोच में डूब गये। पार्क की प्रशासन समिति से इस बारे में कई बार शिकायत करने पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई थी। ‘कुछ तो करना पड़ेगा’ सोच कर दादाजी ने निश्चय किया।
अगली सुबह दादाजी, अपने मित्रों, बागवानी के कुछ औजार और बच्चों को लेकर पार्क में पहुंच गए। पार्क के माली के साथ मिलकर सब लोग पार्क को ठीक करने में लग गए। पहले तो आरव और अमायरा ने आनाकानी की, फिर वो भी अपने छोटे छोटे हाथों से टूटी डालियां और कचरे को डस्ट बीन में डालने लगे। पार्क में घूमने आए कुछ लोग और बच्चे भी सहयोग करने लगे। खराब हो गए पौधों को हटाया, पेड़ पौधों की कटाई छँटाई की और क्यारियों को व्यवस्थित किया। देखते ही देखते पार्क का रूप बदलने लगा। अब रोज़ाना सुबह यही कार्यक्रम चलता।
दादा जी ने पेड़ों के पास कुछ पुराने मटकों में पानी रखवाया जिस से नमी बनी रहे। फिर तो कोई पक्षियों के लिए पेड़ों पर परिंडे बांध रहा था, कोई घोंसला लगा रहा था तो कोई पेड़ों को पानी दे रहा था। कुछ दिनों में ही मुरझाए हुए पौधों में जान लौटने लगी। मोगरे, चमेली, गुड़हल जैसे कुछ पौधों में कलियाँ आने लगी। नए पौधे लगाने की तैयारी भी शुरू हो गई। अब आरव, अमायरा और बच्चों के लिए पार्क में खेलने के अलावा एक और लक्ष्य हो गया; अपने पार्क को साफ रखना और पेड़ पौधों की देखभाल करना।
एक दिन दादाजी ने सभी बच्चों को इकट्ठा किया और उनको एक एक चॉकलेट देते हुए कहा, ‘बच्चों, हाथ पर हाथ रख कर बैठना और चीजों में कमियां निकालना आसान है; पर कहते हैं ना ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ यानी सुधार तभी होता है जब आगे बढ़ कर स्वयं काम किया जाए। यदि लक्ष्य सही है तो लोग भी जुड़ जाते हैं जैसे सबने मिल कर इस उजड़े हुए पार्क को हरा भरा और खूशबुदार फूलों से भरे बाग़ में बदल दिया।’ दादा जी ने सहज रूप से बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूकता सिखा दी थी। बच्चे वहां उड़ रहीं रंगबिरंगी तितलियों के पीछे भागते हुए बेहद खुश थे।
(लेखिका राजकीय महाविद्यालय, सुजानगढ़ (चूरू) की सेवानिवृत्त सह आचार्य हैं)
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