22 मई अन्तररष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष पर
डॉ. विनीता राठौड़
अपने बचपन में सीखी थी,
यह सुन्दर कविता
फूलों से नित हंसना सीखो ,
भौंरो से नित गाना।
मैं कहती हूँ जीवों से सीखो,
प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरना।
प्रोटोजोआ के सूक्ष्म जीवों से सीखो,
पुटीभवन द्वारा स्वयं सुरक्षित हो जाना।
स्वच्छ जलीय स्पंजों से सीखो,
लघु पत्र कलिका बना कर बचना।
मूंगों से सीखो,
प्रवाल भित्ति बना कर दृढ़ता पूर्वक जीना।
रेशम कीट व तितलियों से सीखो,
कोकून में विकसित होना।
साधु केंकड़े से सीखो,
घोंघे के खाली कवच में सन्तुष्ट जीवन यापन करना।
सीप से सीखो,
बाह्य कवच के भीतर जीवित रहना।
ध्रुवीय भालू से सीखो,
शीत निष्क्रियता द्वारा सर्दी से बच जाना।
मेंढक से सीखो,
ग्रीष्म निष्क्रियता द्वारा गरमी से बच पाना।
सब जीव हमें सिखाते हैं,
प्रतिकूल परिस्थितियों से कैसे है बचना।
शांत दुबके रह कर सिखाते,
अनुकूल परिस्थितियों का इन्तजार करना।
विविध प्रयासों द्वारा सिखाते,
हर हाल में अपनी प्रजाति बचाना।
सीखो इन जीवों से हे मानव,
विकट काल गृहावास में बिताना।
समय की यही पुकार है,
गर मानव प्रजाति को सुरक्षित है रखना।
जीत कर जीवन की इस जंग को,
अनुकूल परिस्थितियों में फिर से मौज मनाना।
मधुर ताल मुरली की बजाना,
और गीत खुशियों के गाना।
( लेखिका राजकीय महाविद्यालय, नाथद्वारा में प्राणीशास्त्र की सह आचार्य हैं)
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