‘सत्ता परिवर्तन नहीं, अपने पिट्ठू बैठाना मकसद’… मोहन भागवत के बयान में छिपा बड़ा राजनीतिक संदेश

मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव में सत्ता परिवर्तन, विरोध प्रदर्शनों, सामाजिक असंतोष और राष्ट्रीय एकता पर विचार रखे। जानिए उनके संबोधन की प्रमुख बातें।

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत का संबोधन केवल संगठन की विचारधारा तक सीमित नहीं रहा। सत्ता परिवर्तन की मांग, विरोध प्रदर्शनों, सामाजिक असंतोष और देश को बांटने वाली ताकतों का जिक्र करते हुए उन्होंने आंदोलन की मंशा और उसके तरीकों पर सवाल खड़े किए। बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात का संदर्भ देकर भागवत ने आगाह किया कि विरोध के पीछे बदलाव की मांग हो सकती है, लेकिन हर सत्ता परिवर्तन का उद्देश्य व्यवस्था सुधारना ही हो, यह जरूरी नहीं।

उनके भाषण का केंद्रीय संदेश था कि असहमति और आंदोलन लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब विरोध संवाद की जगह टकराव और समाधान की जगह दुश्मनी को बढ़ाने लगे, तब उसके उद्देश्य पर विचार करना जरूरी हो जाता है।

सत्ता परिवर्तन की मांग पर भागवत की सीधी टिप्पणी

नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि दुनिया में ऐसी शक्तियां हैं, जो भारत को दबाना चाहती हैं। उनके मुताबिक, इन शक्तियों का उद्देश्य केवल सत्ता बदलकर परिस्थितियों को सुधारना नहीं, बल्कि अपने समर्थकों को सत्ता में बैठाना भी हो सकता है।

भागवत ने भारत में बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिशों का उल्लेख करते हुए लोगों को उकसावे से बचने की सलाह दी। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ ताकतें भारत और हिंदू समाज को तोड़ना चाहती हैं और उन्हें ऐसे नेताओं का समर्थन भी मिलता है। इन टिप्पणियों के जरिए उन्होंने राजनीतिक विरोध को केवल सत्ता और विपक्ष के बीच का संघर्ष मानने के बजाय उसके पीछे संभावित उद्देश्यों पर ध्यान देने की बात रखी। हालांकि, अपने संबोधन में उन्होंने जिन ताकतों और नेताओं का उल्लेख किया, उनके नाम नहीं बताए।

आंदोलन का उद्देश्य समाधान या लोकप्रियता?

भागवत के संबोधन में आंदोलनों की भूमिका एक प्रमुख विषय रही। उन्होंने माना कि समाज में समस्याएं पैदा होती हैं और उनके विरोध में आंदोलन भी होते हैं, लेकिन आंदोलन का लक्ष्य समाधान खोजना होना चाहिए। उनका कहना था कि विरोध के नाम पर समाज में दुश्मनी फैलाना उचित नहीं है। आंदोलनों में मर्यादा का पालन होना चाहिए और किसी मुद्दे पर टकराव बढ़ाने के बजाय संवाद के रास्ते तलाशे जाने चाहिए।

उन्होंने वोट हासिल करने और सस्ती लोकप्रियता पाने को आंदोलनों का उद्देश्य बनाने पर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक, वास्तविक समाधान आपसी चर्चा और संवाद से निकलते हैं। इस तर्क में भागवत ने विरोध करने के अधिकार से अधिक उसके उद्देश्य और तरीके पर जोर दिया। उनके संदेश का आशय यह था कि किसी समस्या के खिलाफ आवाज उठाने और उस समस्या के बहाने समाज में असंतोष बढ़ाने के बीच अंतर समझना जरूरी है।

बंगाल विभाजन से 1947 तक का संदर्भ क्यों आया?

भागवत ने अपने तर्क को ऐतिहासिक संदर्भों से भी जोड़ा। उन्होंने लॉर्ड कर्जन के समय हिंदू-मुस्लिम आधार पर बंगाल के विभाजन का उल्लेख किया और कहा कि चार साल बाद यह विभाजन वापस लेना पड़ा। इसके साथ ही उन्होंने 1947 में देश के विभाजन का संदर्भ देते हुए कहा कि उस समय लोगों के मन में यह धारणा बन गई थी कि जो अलग दिखाई देते हैं, वे अलग ही हैं और इसी मानसिकता के कारण विभाजन नहीं रुक सका।

इस उदाहरण के जरिए भागवत ने समाज के भीतर गहरी होती अलगाव की भावना को लेकर चिंता जताई। उनके संबोधन में इतिहास का यह संदर्भ वर्तमान के लिए एक चेतावनी के रूप में सामने आया—समाज में अलग पहचान को स्थायी दूरी में बदलने वाली सोच एकता के लिए चुनौती बन सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ ताकतें लोगों में पीड़ित होने की भावना पैदा कर असंतोष और अराजकता को बढ़ावा देने का प्रयास करती हैं। ऐसे प्रयासों के प्रति सतर्क रहने और उकसावे में आए बिना सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की अपील उन्होंने की।

विविधता को विभाजन नहीं, एकता का आधार बनाने पर जोर

राष्ट्रीय एकता की चर्चा करते हुए भागवत ने पूजा-पद्धतियों के अंतर को लेकर बनी गलत धारणाओं को छोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने विविधता को अलगाव की नजर से देखने के बजाय उसे देश की एकता के आधार के रूप में स्वीकार करने पर जोर दिया। उनके अनुसार, भारत के प्रति समर्पण, अपने पूर्वजों पर गर्व और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता ऐसे तीन सूत्र हैं, जो समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

यहां उनका जोर केवल अलग-अलग समुदायों के बीच सह-अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उन साझा मूल्यों पर था, जिनके आधार पर राष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर राष्ट्रीय हित को रखने और देश को विश्वगुरु बनाने के लक्ष्य को हमेशा सामने रखने की बात भी कही।

OTT पर नियम और AI के सही इस्तेमाल की बात

भागवत ने बदलते सूचना परिवेश का जिक्र करते हुए कहा कि आज लोगों को हर तरह की जानकारी उपलब्ध हो रही है, लेकिन सही और गलत का अंतर समझे बिना उसका इस्तेमाल नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने OTT प्लेटफॉर्म पर नियमों की जरूरत बताई और कहा कि सरकार तथा प्रशासन को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सही इस्तेमाल पर भी जोर दिया।

इस तरह उनके संबोधन में सामाजिक और राजनीतिक एकता के साथ सूचना के उपयोग तथा नई तकनीक से जुड़ी जिम्मेदारियों का विषय भी शामिल रहा।

संघ के 100 वर्ष और प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी। संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर नागपुर में आयोजित शताब्दी वर्ष उत्सव में भागवत ने शस्त्र पूजन किया और संबोधन दिया। कार्यक्रम में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी डॉ. सुदेश धनखड़, इजराइल के काउंसल जनरल यानिव रेवाच, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भागवत के संबोधन की सराहना की। उन्होंने भाषण को प्रेरणादायी बताते हुए कहा कि इसमें राष्ट्रीय प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और समाज के चरित्र को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर विस्तार से बात की गई। मोदी ने सेवा, राष्ट्र निर्माण और स्वयंसेवकों की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए पंच परिवर्तन की अवधारणा पर भी भागवत के विचारों को रेखांकित किया।

भाषण का बड़ा सवाल: असहमति की दिशा क्या हो?

भागवत के पूरे संबोधन को देखें तो उसका प्रमुख सूत्र सामाजिक एकता और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देना रहा। सत्ता परिवर्तन की मांग पर उनकी टिप्पणी, आंदोलनों की मंशा पर सवाल, 1947 के विभाजन का संदर्भ और विविधता को एकता का आधार बनाने की अपील—ये सभी बातें एक ही वैचारिक धुरी से जुड़ती हैं।

उनका संदेश स्पष्ट था कि विरोध और असहमति को समाज में स्थायी दुश्मनी का कारण नहीं बनना चाहिए। लेकिन उनके भाषण से एक व्यापक सवाल भी उभरता है: किसी आंदोलन का उद्देश्य और उसकी दिशा तय करने में संवाद, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक जिम्मेदारी की भूमिका क्या होनी चाहिए? विजयादशमी के मंच से भागवत ने इसी सवाल को राष्ट्रीय एकता और देश की भावी दिशा से जोड़कर रखा।

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